रविवार, 26 जनवरी 2014


लालकिले से  (भाग-18)

                           हे, गणतंत्र के  एक अराजक मुख्यमंत्री                            -- -- हमारा गणतंत्र सदैव अमर रहेगा




णतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर आए दो बयानों ने हमारे गणतंत्र पर मंडरा रहे अराजकता के खतरे की ओर संकेत किया है। यानी अपना काम बनाने  के लिए नेता किसी भी हद कर जा रहे हैं यानी अराजकता का भी इस्तेमाल करने से नहीं चूक रहे हैं। यानी इशारा सीधा दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर है। यहां हमने इन बयानों का संविधान की सीमा में खोजने की कोशिश की है।
१. लोकलुभावन अराजकता लोकतंत्र का विकल्प नहीं हो सकती                                                           -                                                                                               -प्रणव मुखर्जी राष्ट्रपति भारत गणराज्य
२. संविधान में यह कहीं नहीं लिखा की एक मुख्यमंत्री धरना नहीं दे सकता                                                                                                                                          - अरविंद केजरीवाल, मुख्यमंत्री दिल्ली राज्य
भीड़ अराजक ही होती है। उसे नियंत्रण में लाकर अनुशासित या भागीदार बनाने की प्रक्रिया का नाम है गणतंत्र या रिपब्लिक । एक प्रक्रिया के माध्यम से उसी भीड़ से से कुछ गण चुनकर उन्हें ही उस अराजक भीड़ पर शासन करने का जिम्मा दिया जाता है। यह प्रक्रिया है लोकतंत्र या डेमाक्रेसी। गणतंत्र की यह प्रक्रिया यजुर्वेद के श्लोक- गणानां त्वां गणपति गुं हवामहे---- में निहित है। यानी गणों का पति या स्वामी ही गणेश यानी लीडर होता है। यानी हम सभी शुभ कामों के पहले एक ऐसे गणपति या लीडर को पूजते हैं जो अराजकता को अनुशासन और शासन में बदलता है।
केजरीवाल ने धरने के दौरान कहा मैं अराजक हूं। यानी वे चुने जाने के बाद भी अभी भी स्वीकार करते हैं कि- हां मैं अराजक हूं। उनकी कार्यशैली को देखें तो उसका आधार ही लोक  लुभावन बाते हैं। यानी दोनों को मिला दें तो लोकलुभावन अराजकता अस्तित्व में आती है। यानी की महामहिम ने गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम दिए अपने संदेश में केजरीवाल ने जनहितों की आड़ लेकर दिल्ली को  धरने के माध्यम से 32 घंटे बंधक बनाने और लोकतंत्र की
लोगों को बिजली बिल नहीं भरने के लिए प्रेरित करना, बिना पैसे दिए बिजली का उपयोग करने के लिए प्रेरित करना, पूरे नहीं किए जा सकने वाले वादे करना, पुलिस को विद्रोह के प्रेरित करना, बिना अुनमति लिए धरना देना, निषेघाज्ञा तोडऩा और कौन सा गणतंत्र वाला बयान अराजकता का जीता-जागता नमूना है।
केजरीवाल ने गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर यह कहा कि संविधान में कहीं नहीं लिखा है कि मुख्यमंत्री धरना नहीं दे सकता। उनका मतलब शब्दत: लिखी बात  की ओर ही है तो यह भी सवाल उठता है कि संविधान में कहीं यह भी नहीं लिखा है कि मुख्यमंत्री धरना दे सकता है। सवाल है कि क्या राज्य में कानून बनाने वाली सर्वोच्य संस्था विधायिका का प्रमुख कानून तोड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली और केन्द्र सरकार को इसी बात पर नोटिस भी दिए हुए हैं।
अगर केजरीवाल जी जानना चाहते हैं कि उन्होंने धरना देकर संविधान को कैसे तोड़ा है तो भारत का संविधान खोलकर बैठ जाएं। भारत में कानून का शासन यानी रूल आफ ला को तोड़ा। भारत में रूल आफ यानी संविधान सर्वोच्य है।
१. संविधान की तीसरी अनुसूची में अनुच्छेद 75(4), 84(क), 99, 124(6), 148(2), 164(3), 173(क),188 और 219 को ध्यान में रखते हुए शपथ का प्रारूप बनाया है। यह शपथ तो अरविंद केजरीवाल ने रामलीला मैदान में हजारों लोगों के सामने ली थी। इसमें एक बात यह भी थी कि मैं अरविंद केजरीवाल विधि द्वारा प्रस्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूंगा, मैं भारत की प्रभुता और अखंडता अक्षुण्य रखूंगा। सबसे पहले उन्होंने संविधान के प्रति निष्ठा और फिर एकता- अखंडता बनाए रखने की शपथ तोड़ी है।
२. कौन सा गणतंत्र कहकर उन्होंने संविधान और उसकी शपथ की अवमानना की है। आम तौर पर नक्सलवादी और प्रगतिवादी विचार के तौर  इस प्रकार गणतंत्र दिवस की अवहेलना करते हैं। चुने हुए मुख्यमंत्री का ऐसा कहने का मामला पहली बार आया है।
३. विधि के शासन के नियमों को ताक पर रखकर खुद धरने पर बैठ गए। धरने के लिए न तो उन्होंने नियमानुसार अनुमति ली और न ही सुप्रीम कोर्ट के नियमों का पालन किया। दिल्ली में अनुमति के बाद सिर्फ जंतर मंतर पर धरना दिया जा सकता है। लोकतंत्र में धरना-प्रदर्शन को अपनी बात कहने का एक माध्यम माना जाता है इसलिए इस पर पूरी तरह रोक नहंीं है। अगर अरविंद केजरीवाल के लिए धरना देना इतना ही जरूरी था वे जंतर-मंतर, रामलीला मैदान पर सांकेतिक धरना दे सकते थे। सरदार सरोवर बांध के मुद्दे पर गुजरात के मुख्यमंत्री भी सांकेतिक धरना दे चुके हैं।
४. पुलिस को विद्रोह करने के लिए भडक़ाया। यानी राज्य या राष्ट्र के खिलाफ विद्रोह करने के लिए बात कही। सशस्त्र बलों के संदर्भ में ऐसा करना  भारतीय दंड संहिता के तहत भी गंभीर किस्म का अपराध है।
५. गृहमंत्री मुझे यानी केजरीवल को कैसे बता सकता है कि दिल्ली का मुख्यमंत्री कहां पाए न जाए यह कहकर उन्होंने यह संकेत देने का प्रयास किया कि वे संविधान से उपर हैं। इस देश में संविधान ही सर्वोपरि है बाकी सब उससे नीचे। यह भारत के संघीय ढांचे को भी चुनौती है। अगर कहीं निशेधाज्ञा लगी है तो मुख्यमंत्री भी उसे नहीं तोड़ सकत हेैं। यानी फिर उन्होंने कानून के शासन को तोड़ा हैद्ध
राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी इस पद पर आने से पहले कंाग्रेसी थे इसलिए कुछ लोग उनके भाषण को राजनीति के चश्मे से भी देख रहे हैं। कारण कि भाषण को सरकार की नीति के रूप में देखा जाता है। अगर ऐसा भी है तो इसमें एक दूसरी किस्म की अराजकता की बात भी छुपी है। राष्ट्रपति ने जिस लोकलुभावन अराजकता का जिक्र किया है उसमें एक तो केजरीवाल के धरने के तौर पर दिख रही है और दूसरी जो दिख नहीं रही है जो कि ज्यादा खतरनाक है। वोट पाने के लिए पहले लोकलुभावन वादे करना फिर उन्हें पूरे नहीं करना या लागू करने के लिए शर्तें लागू करना जनता को पहले परेशान करती है फिर उन्हें लोकतांत्रिक प्रकिया से दूर करती है। इससे जनता मन में यह धारणा बना लेती है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया से कुछ होना जान नहीं है। यानी मानसिक तौर पर पहले लोकतंत्र के प्रति नाराजगी का भाव आता है। एक समय बाद वह अराजकता के भाव में बदलने लगता है। यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।
लेकिन चिंता की बात नहीं है हमारे संविधान निर्माता लोग दूरगामी थे। उन्होंने भविष्य में बनने वाली स्थितियों की पहले से ही कल्पना कर ली थी इसीलिए उन्होंने देश को व्यक्ति नहीं संविधान द्वार शासित बनाया और यही हमें इसी अराजकता से निपटने की ताकत देती है। तभी सुप्रीम कोर्ट जिसके पास कि संविधान की व्याखया करने का एक मात्र और अंतिम अधिकार है केन्द्र और दिल्ली सरकार ने धरना देने के अधिकार और पुलिस की मूकदर्शकता पर सवाल उठाए हैं। मान के चलिए कि अरविंद केजरीवाल, केन्द्र सरकार और दिल्ली पुलिस को सुप्रीम कोर्ट की कम से कम फटकार तो तय है। साथ ही कोर्ट यह भी तय कर देगा कि मुख्यमंत्री धरना दे सकता है या नहीं और सांकेतिक रूप स अगर दे भी सकता है तो किस अनुशासन के साथ। कारण कि देश की सर्वोच्य अदालत के सामने प्रश्न है कि क्या कानून बनाने वाला कानून तोड़ सकता है। तय है जवाब नहीं ही आएगा।
यानी नारा लगाईए हमारा गणतंत्र अमर रहे।

बुधवार, 22 जनवरी 2014

लालकिले से (भाग-15) डेमोक्रेसी में ये कैसी ड्रामाक्रेसी?


लालकिले से  (भाग-15)

डेमोक्रेसी में ये कैसी ड्रामाक्रेसी?


 हमारी डेमाक्रेसी में इन दिनों ड्रामाक्रेसी का दौर चल रहा है। नाटकों के बीच नौटंकी, राजनीतिक प्रहसनों की नाटकीयता और अति नाटकीयता की होड़ सी लगी है। नरेन्द्र मोदी चाय वाले को समाज में पीछे से आगे लाने का ओबीसी सोश्यल ड्रामा देश को दिखा रहे हैं। राहुल गांधी मोदी की शैली में भाषण देेना चाह रहे हैं। पर देश को विजन देने के बजाय तीन सिलेंडर थमा देते हैं। दिल्ली कांग्रेस केजरीवाल से सीखते हुए समर्थन वापसी के लिए केजरीवाल की ही तर्ज पर रेपरेंडम करने का फैसला कर चुकी है। भाजपा काली टोपी के साथ भगवा टोपी की ओर जा रही है। केजरीवाल लगातार इतने बयान बदल  रहे हैं कि शब्द यू टर्न बार-बार घूम-घूम कर जलेबी बन गया है। दीवाना खुद के बयानों की मार तले पागल हो रहा है। महाराष्ट्र का एक हवलदार सारी दिल्ली को पुलिस की आड़ में ऐड़ा बना रहा है। बाबू ये नाटकों का दौर है। सब अपनी-अपनी स्क्रिप्ट के किरदार हैं। 

गणतंत्र को गरियाने का नाटक नहीं चलेगा

नाटक की शुरूआत आम आदमी पार्टी ने की। जिस कांग्रेस को पानी पी-पीकर कोसा उसी से समर्थन लेने के लिए रेफरेंडम का नाटक। सरकार बन गई और कुछ नहीं कर पाए तो उसे छुपाने और लोकसभा चुनाव के लिए धरने का नया नाटक। पर इस नाटक में गणतंत्र को गरियाने की अतिनाटकीयता कर बैठे मफलररामजी।  तभी तो पीछे हटना पड़ा। जिस लोकतंत्र की बलिहारी से आप वाले दिल्ली के तख्त पर आए तो उसे ही झुठलाने का अहम। गणतंत्र को गाली देने का दुस्साहस। झाडूवालों को  दिल्ली का जो तख्तो-ताज कुछ महीनों के संघर्ष मात्र से मिल गया इतिहास गवाह है कि उसे पाने के लिए हेमू से लेकर बहादुरशाह जफर और फिर अंग्रजों को कितनों का खून बहाना पड़ा। यही इंद्रप्रस्थ महाभारत के युद्ध का कारण बना। पहले मुगलों और फिर अंग्रेजों से  देश को आजाद कराने के लिए लाखों ने कुर्बानी दी। जब आजाद हुए तो आजादी को संविधान लिखकर अनुशासन में बांध दिया गया। ताकि कोई सिरफिरा इसपर सवाल न उठा सके। इसलिए हम दुनिया का सबसे बड़ा गणतंत्र हैं। हर चीज नियम कायदों में। और उस गणतंत्र को केजरीवालजी आप गरियाते हैं। इसी गणतंत्र की भावना से केजरीवालजी आपकी दिल्ली में सरकार बनी और देश ने 32 घंटे तक बंधक बनाने के आपके नाटक को झेला। वरना कोई और कोई तंत्र होता को गोलियां चल गईं होती, सैकडों लाशें बिछ गई होती और आप जेल में बंद होते। इसलिए यह कैसा गणतंत्र दिवस वाले बयान के लिए आप देश से माफी मांगे वो भी बिना नाटक किए।

समर्थन वापसी के लिए कांग्रेस करेगी रेफरेंडम 

अब कांग्रेस भी दिल्ली की जनता से रेफरेंडम या जनमत संग्रह कर पूछेगी कि क्या केजरीवाल की सरकार को समर्थन जारी रखना चाहिए या नहीं। जब कांग्रेस वाले रेफरेंडम करेंगे तो जवाब भी उन्हीं के अनुसार ही आएगा। केजरीवाल नें कांग्रेस से समर्थन लेने के लिए रेफरेंडम करवाया तो अब कांग्रेस समर्थन वापसी के मुद्दे पर रेफरेंडम करवाएगी। 26 जनवरी के बाद रेफरेंडम होगा। कांग्रेस का राजनीति करने में कोई सानी नहीं है- यानी केजरीवाल को केजरीवाल की शैली में नाटकीय जवाब। यानी कि समर्थन वापसी की पटकथा लिखनी शुरू हो चुकी है।

यहां घोषणाओं का नाटक और वहां हकीकत

केजरीवाल ने कभी नहीं सोचा था कि सरकार बनाने का उन्हें सममुच में नाटक करना पड़ेेगा। इसलिए असंभव से वादे कर दिए। बिजली- पानी की छूट अभी घोषणाओं में ही है। अमल बजट में आने के बाद ही होगा। हाई मोरल वादे ईमानदारी, सुरक्षा और बड़े बंगले  वाले वादों में तो अब वे लोकसभा चुनाव तक फंस ही गए हैं। सुरक्षा नहीं लेने की ऐसी नौटंकी कि दिल्ली पुलिस का  लगभग 50 सुरक्षाकर्मियों का स्टाफ उनके पीछे लगा रहता है। कारण कि सुरक्षा नहीं ली है। अगर ले लें तो दस में भी काम हो सकता है। पर मुई इस नौटंकी का क्या करें। जनता दरबार से सभी ने टोपीवालों को भागते देखा। आपही के कभी खासमखास रहे विनोद बिन्नी की आउटस्विंग आपसे खेलते ही नहीं बन रही है। कारण कि उन्होंने आपका सच सामने ला दिया। अब जनता धरने पे धरने दे इससे पहले धरने की नौटंकी क्या बुरी है। 

विरोधाभास का यह कैसा नाटक

अरिवंद केजरीवाल धरने पर बैठे और तीन पुलिस वालों के मुद्दे को इससे जोड़ दिया कि दिल्ली पुलिस राज्य के नियंत्रण में हो। केजरीवालजी यह कैसा विरोधाभास है कि जब जनलोकपाल की बात आती हैं तो आप सीबीआई तो लोकपाल के तहत लाने की बात करते हो और जब खुद आपके राज्य की बात आती है तो आप पुलिस को अपने नियंत्रण में लाने की बात करते हो। यह विरोधाभास का कैसा नाटक है।
दीवानों और  पागलों की नाटकीयता
उधर कविराज बयानों की नाटकीयता में उलझे इुए हैं। केरल की सेवाभावी नर्सों पर की गई टिप्पणी पीछे पड़ गई उपर से यह कहकर कि फिल्म इंसाफ का तराजू में किए बलात्कार के लिए क्या कांग्रेस राजबब्बर से माफी मांगने को कहेगी अपनी अति नाटकीयता का परिचय दिया। अरे भई फिल्म कैसी होगी इसे सेंसर बोर्ड पास करता है। इसलिए तो फिल्म को ए प्रमाण- पत्र मिला। आप तो कवि सम्मेलनों में बेरोकटाटे बोलते हैं। कभी संत निशाने पर होते हैं तो कभी सेवाभावी नर्सें। खुद सेंस नहीं रखोगे तो नानसेंस, न्यूसेंस सभी होगा। उस पर महाराष्ट्र वाले हवलदार साहेब बिना नाम लिए केजरीवाल को ऐड़ा मुख्यमंत्री कहने का सुपरफ्लाप डायलाग बकते हैं। हवलदार जी फिल्म पड़ोसन में किशोकुमार के  गीत में शब्द हैं- ओ ऐड़े सीधे हो जा रे। बाकी आप खुद समझदार हैं।

नाटक के बजाय मल्टीस्टारर फिल्म

6 साल पहले जब पत्रकार प्रशांत दयाल तो गुजरात विधानसभा चुनाव के समय स्टोरी छापी थी कि मोदी बचपन में चाय बेचा करते थे। उस समय मोदी समर्थकों को यह स्टोरी अच्छी नहीं लगी थी पर आज इस स्टोरी पर ड्रामे से भी आगे आरएसएस प्रोडक्शन की मल्टीस्टारर फिल्म मिशन 272 प्लस बन रही है। निदेशक हैं राजनाथ। वैसे इसे एकपात्रीय फिल्म कहें तो ज्यादा अच्छा रहेगा।






मंगलवार, 21 जनवरी 2014

लालकिले से (भाग-14) तांगे में जुता बरात का एक घोड़ा और जनता की फजीहत


लालकिले से  (भाग-14)


तांगे में जुता बरात का एक घोड़ा और जनता की फजीहत



एक किस्सा है। एक तांगा हर तीस-चालीस कदम जाकर रूक जाता। रूकते ही तांगे वाला उतरता, डांस करता, फिर अपनी सीट पर बैठ जाता। तब कहीं जाकर तांगा आगे बढ़ता। फिर तीस-चालीस कदम बाद तांगा रूक जाता। फिर वही उतरने और नाचने की नौटंकी। जब तीन- चार बार ऐसा हो गया तो तांगे में बैठी सवारी से रहा नहीं गया। उसने तांगे वाले से पूछ ही लिया कि यह क्या लगा रखा है। तांगे वाले ने कहा- बाबूजी माफ करें, दरअसल आज मेरा घोड़ा बीमार है इसलिए मैंने इसमें बरात का घोड़ा जोत दिया है। कमबख्त को हर तीस-चालीस कदम पर डांस देखने की आदत है इसलिए डांस देखे बगैर आगे बढ़ता ही नहीं। मेरी भी मजबूरी है, ंइसे चलाने के लिए डांस करने की। अब क्या करूं।
दिल्ली के जनता के हाल भी इसी तांगे वाले जैसे हो गए हैं। बेचारे क्या करे। आंदोलन वाले घोड़े को सत्ता की बरात में जोत दिया। अब उसे को आंदोलन की आदत है। धरना-प्रदर्शन तो करेगा ही बे चारा।
१. दरअसल बिजली पानी के मुद्दों पर जोर-शोर से घोषणाएं करने के बाद जमीनी हकीकत शून्य है। बजट में प्रावधान किए बगैर इन्हें लागू नहीं किया जा सकेगा।
२. जनलोकपाल लाना मुश्किल है। कारण कि बाद में अन्ना को यह समझ में आ गया वे इस जिस जनलोकपाल की बात कर रहे थे उसका कद प्रधानमंत्री से भी बड़ा है और यह लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं है।
३. शीला दीक्षित के राष्ट्रमंडल खेल घोटाले समेत कांग्रेस के दर्जनों घोटालों पर अगर कार्रवाई करते हैं तो गृह मंत्रालय केजरीवाल और उनके एनजीओ के खिलाफ सीआईए समर्थित फोर्ड फाउंडेशन से फंडिग और आप को विदेशों से अनुमति लिए बगैर चंदा लेने के मामले में घेर सकता है।
४. कर्मचारियों को नियमित करने के लिए बजट कहां से आएगा। क्योंकि वो तो पानी-बिजली की सब्सिडी में चला जाएगा। दिल्ली सचिवालय के बाहर चल रहे शिक्षकों के धरने में जाकर उनकी बात सुनने की मुख्यमंत्री को फुरसत ही नहीं है।
५. दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं दिया जा सकता। कारण कि दिल्ली के राजधानी सिस्टम को वाशिंगटन डीसी की तर्ज पर बनाया गया है। संविधान के अनुच्छेद-239 के अनुसार दिल्ली की पुलिस केन्द्रीय गृह मंत्रालय के अधीन होगीञ्। भाजपा-कांग्रेस ने लोगों को अभी तक अंधरे में रखा कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने में परेशानियां हैं। केजरीवाल की धरना नौटंकी के बाद तो दिल्ली को यह दर्जा मिलने वाली संभावनाएं बिल्कुल समाप्त हो गईं हैं। कारण कि दिल्ली में केजरीवाल टाइप मुख्यमंत्री को पुलिस मिल जाए तो फिर तो प्रधानमंत्री पर भी मुख्यमंत्री कार्रवाई करवा सकता है। मोदी टाइप हो तो अमेरिकी दूतावास की खैर नहीं। दिल्ली के बाहरी इलाकों के लिए राज्य की पुलिस या दोहरी रिपोर्टिंग जैसी समन्वय वाली व्यवस्थाएं ही यहां लागू हो सकती हैं।
६. जब पुलिस ही नहीं है तो महिला सुरक्षा कहां से होगी। महिला कमान्डो टीम का गठन और उन्हें प्रशिक्षित करने में कम से कम दो साल चाहिए।
७. अवैध कालोनियों का नियमन और वहां पानी, सडक़, और सीवरेज की व्यवस्था करना खर्चीला और लंबे समय का काम है।
८. आम आदमी पार्टी के विधायक विनोद कुमार बिन्नी ने ही केजरीवाल और उनके चमचों की पोल खोल दी है। उनके साथ तीन-चार और विधायक बगावत करने के लिए तैयार हैं।  जिस कांग्रेस के खिलाफ जनता ने उन्हें जिताया उसी से उन्होंने घालमेल कर सरकार बना ली।
९. अरविंद केजरीवाल ने जितनी घोषणाएं की हैं उन्हें पूरा करने लिए एक लाख करोड रूपए चाहिए। इतना पैसा आएगा कहां से।
१०. राबर्ट वाड्रा, जिंदल और अंबानी पर आरोप लगाने का माद्दा नहीं बचा। पता नहीं इनके खिलाफ क्यों चुप बैठे हैं।
११. रही सही कसर केजरीवाल मंत्रिमंडल के दो मंत्रियों सोमनाथ भारतीय, राखी बिड़लान पर लगे आरोपों ने पूरी कर दी। राखी तो ठीक सोमनाथ भारतीय पर विदेशी महिलाओ के मोलेस्टशन और एक न्यायिक मामले में सबूतों से छेड़छाड के गंभीर आरोप हैं।                                      
अब आम आदमी पार्टी की नजर लोकसभा चुनाव पर है। महीने भर बाद आचार संहिता  लग जाएगी। काम कुछ दिख नहीं रहे हैं। जनता दरबार में वे लोगों के अपेक्षा और आक्रोश दोनों ही देख चुके हैं।
 ऐसे में जनता उनके खिलाफ धरना दे वे पुलिस को मुद्दा बनाकर महाराष्ट्र पुलिस के एक पुराने हवलदार के खिलाफ धरने पर बैठ गए। कारण कि बरात की घोड़ी को तांगे में जुतने पर चलने के लिए डांस का सहारा लेना पड़ता है सो धरना चालू है इसे था पढें।












लालकिले से  (भाग-13)

सुप्रीम कोर्ट के डर, गणतंत्र दिवस विरोधी बयान और अराजकता पर मीडिया के स्टंैड के कारण केजरीवाल को पीछे हटना पड़ा

दोनों एसएचओ को छुट्टी पर जाने के लिए केजरीवाल के पीएस राजेन्द्र ने राजी किया, केन्द्र सरकार ने एक भी शर्त नहीं मानी





दिल्ली पुलिस के तीन एसएचओ के बहाने देश भर में माहौल बनाने के लिए दस दिन तक धरने की तैयारी से आए केजरीवाल को 32 घंटे में ही अपना आंदोलन वापस लेना पड़ा। जिसे वह अपनी जीत बता रहे है वह उनकी हार है। दरअसल केन्द्र ने उनकी एक भी शर्त नहीं मानी। जिन दो एसएचओ को छुट़टी पर भेजे जाने की खबरें आ रही हैं उन्हें खुद केजरीवाल के सचिव राजेन्द्र कुमार ने लाखें मिन्नतें कर छु़ट़टी पर जाने को राजी किया। इसके बाद दोपहर 1 बजे उप राज्यपाल नजीब जंग के घर योगेन्द्र यादव लंच पर गए और धरना खत्म करने की पेशकश की। इसके बाद रात 8 बजे के बाद उप राज्यपाल ने अरविंद केजरीवाल से अपील की कि गणतंत्र दिवस और सुरक्षा के मुद्दे पर धरना खत्म कर दें। केजरीवाल तो उधार ही बैठे थे। उन्होंने अपने अधसच्चे भाषण के साथ धरना समाप्त करने का ऐलान कर दिया।  इस पांच मुद्दों के कारण केजरीवाल को पीछे हटना पड़ा और उनकी भारी किरकिरी हुई।

1.सुप्रीम कोर्ट में याचिका स्वीकार 

सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को धरने को लेकर अरविंद केजरीवाल और मंत्री सोमनाथ के खिलाफ एक जनहित याचिका दायर की गई है। इसे सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया है। मुख्य न्यायाधीश पी सतशिवम ने  इस पर शुक्रवार को सुनावाई करेंगे। इस याचिका में धरने से होने वाली अव्यवस्था और सोमनाथ भारती को बचाने के विषय को उठाया गया है। जब तक केजरीवाल और उनकी टीम को इसकी भनक लगी कि याचिका स्वीकार हो गई है तब तक लुटियंस विला में अराजकता से  हालात बन चुके थे। तब लगा कि कहीं कोर्ट शुक्रवार को इस अराजकता पर कोई सख्त बात न कह दे ले इसलिए तुरत-फुरत धरना समेटने की पटकथा लिख दी गई। इसलिए आप ने केन्द्र के सामने हथियार डालते हुए सम्मानजनक फार्मूले की बात  उप राज्यपाल के मार्फत कही। सुप्रीम कोर्टमें इस विषय पर दिल्ली और केन्द्र सरकार की किरकिरी होनी तय है। कारण कि  धरना प्रकरण में केजरीवाल ने  संविधान और कानून की जमकर धज्जियां उड़ाई हैं।

2.गणतंत्र और मीडिया का विरोध महंगा पड़ा 

ये कोई गणतंत्र दिवस है। ये  गणतंत्र और वीआईपी लोगों के लिए है। असली गणतंत्र तो ये है। इसकी विपरीत प्रतिक्रिया हुई। मीडिया और केजरीवाल के समर्थकों की ओर से भी इसकी विपरीत प्रतिक्रिया आने लगी। मीडिया भी इस तरीके को अराजक बताने लगा। मैट्रो और रास्ते बंद होने से जनता भी विरोध में आने लगी। अपेक्षित समर्थन भी नहीं मिला। केजरीवाल को लगने लगा कि गणतंत्र का विरोध करने से कहीं उन्हें देशद्रोही की उपमा न मिल जाए। उन्होंने धरना समाप्त करने का फैसला किया और दो टीमों को काम पर लगाया। पाकिस्तानी मीडिया ने आज केजरीवाल के गणतंत्र वाले मुद्दे पर जम्हूरियत का खूब मजाक उड़ाया।

3. खुद एसएचओ को छुट्टी पर जाने के लिए राजी किया

दिल्ली सचिवालय में पहली टीम में केजरीवाल के पीएस राजेन्द्र कुमार ने दोनों एसएचओ को छुट्टी पर जाने को राजी किया। इसी दौरान एलजी नफीज जंग के घर पर लंच के बहाने अरविंद के शांति दूत बनकर योगेन्द्र यादव गए। और कहा कि दो एसएचओ को छुट्टी पर जाने के लिए हमने राजी कर लिया है अत: आप जांच तक दोनों को छुृ्रट़टी पर भेजने की घोषणा करें। इसके बाद शाम को गृहमंत्री सुशील कुमार शिन्दे राहुल गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह राष्टपति से मिलने गए और उनसे इस मामले पर उनकी मुहर लगवाई।

4.पुलिस की सख्ती और सेना का डर 

दोहपर में बाधाएं हटाकर रेलवे भवन की ओर जाने को प्रयास कर रहे आप कार्यकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के लाठीचार्ज के बाद धरना स्थल को रैपिड एक् शन फोर्स ने घेर लिया। इससे भी केजरीवाल को लगा अब केन्द्र सख्ती कर सकता है। इसी बीच रेलवे भवन को बंद कर धरना स्थल  को कल तक खाली करने के लिए अल्टीमेटम दे दिया गया। कारण कि कल से इस सारे इलाके का कब्जा सेना अपने हाथ में ले लेगी। सेना को कल तक कैसे भी करके यह स्थान खाली करके देना था।

5. कांग्रेस ने केजरीवाल को आइना  दिखाया

केजरीवाल को गेमप्लान का था कि सरकार शहीद करवाकर वे नेशनल हीरो बन जाएं जाएंगे पर महाराष्ट्र पुलिस के एक पुराने कांस्टेबल ने उनका सारा खेल बिगाड़ दिया। न मांगे मानी और माहौल को इतना अराजक होने दिया कि देश में केजरीवाल की छवि बिगड़े। एसएचओ को छुट्टी पर भेजने के बारे में गृहमंत्री और एलजी की ओर से कोई आफिसियल बयान नहीं आया है। सारा समझौता राजनीतिक बयानबाजी पर आधारित था। लेकिन कांग्रेस ने न समर्थन वापस लिया, न सरकार बर्खास्त हुई और न ही गोली चली। वापस हुआ तो धरना। उसी से ठंडा उसी से गरम की तई पर कांग्रेस ने केजरीवाल से राजनीति खेल डाली।  कुल मिलाकर केजरीवाल का हाल खाया पिया कुछ नहीं गिलास तोड़ा बारह आना जैसा हो गया।











सोमवार, 20 जनवरी 2014

लालकिले से (भाग-1२) मैं अरविंद केजरीवाल ईश्वर की शपथ लेता हूं कि मैं विधि द़वारा प्रस्थापित भारत के संविधान को सडक़ पर ला दूंगा


लालकिले से  (भाग-1२)

मैं अरविंद केजरीवाल ईश्वर की शपथ लेता हूं कि मैं विधि द़वारा प्रस्थापित भारत के संविधान को सडक़ पर ला दूंगा

दिल्ली में सरकारी अराजकता,  अराजकता, अनुच्छेद-356 के तहत बर्खास्त हो सकती है केजरीवाल सरकार, एक भी कानून का पालन नहीं किया


  1.  केजरीवाल ने प्रतिबंधित रायसीना हिल्स क्षेत्र में धारा -144 को तोडा। यहां गणतंत्र दिवस समारोह की तैयारियों के लिए कड़ी सुरक्षा व्यवस्था है। लिहाजा इस तरह के आंदोलन से सुरक्षा में हुई जरा सी भी चूक बड़ी तबाही का सबब बन सकती है।
  2. लोगों को सरकार के एक हिस्से पुलिस के खिलाफ विद्रोह के लिए उकसाया और  इसके लिए देशभर के लोगों से धरना स्थल रेलवे भवन के बाहर आने का आह्वान किया। यह सीधा-सीधा अराजकता हो आमंत्रण। भारतीय दंड संहिता के तहत यह राज्य के खिलाफ विद्रोह का मामला बनता है। शायद यही कारण है कि केन्द्र सरकार ने दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं दिया। पूर्ण राज्य का दर्जा देने पर अगर दोनों सरकारें एक ही राजनैतिक दल की नहीं हुई तो टकराव हो सकता है। केजरीवाल ने आज धरने की जो नौटंकी की है उसके बाद तो दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलने की रही सही संभावनाएं भी खत्म हो गई हैं।
  3. मैं अरविंद केजरीवाल ईश्वर की शपथ लेता हूं कि मैं विधि द्वारा प्रस्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा रखूंगा। रामलीला मैदान में ली गई पहली शपथ का यह वाक्य कैसे भूल गए अरविंद केजरीवाल।
  4. बजट में प्रावधान किए बिना बिजली और पानी बिलों में सब्सिडी की घोषणा कर दी। बेहतर यह होता कि बजट में इसका प्रस्ताव लाते और विधि के शासन के अनुसार काम करते। 
  5. संविधान का अनुच्छेद-356 कहता है कि अगर किसी राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल हो जाने या ऐसी स्थिति उतपन्न हो जाने जिसमें कि राज्य का  शासन संविधान के अनुसार नहीं चलाया जा सकता तो राज्यपाल की सिफारिश पर वहां राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है। सोमवार को केजरीवाल ने जो किया अगर वह एक दो दिन और जारी रहता है या वहां भारी जनसमुदाय एकत्रित होता है तो संवैधानिक तंत्र विफल होने की स्थितियां बन सकती हैं। आईबी ने केन्द्र सरकार को बताया है कि वहां भारी जनसमूह एकत्रित कर पुलिस के खिलाफ विद्रोह करने की योजना है।
  6. अगर सरकार बच भी गई तो वित्त विधेयक पर सरकार का जाना तय है। अगर वित्त विधेयक गिर गया तो मुख्यमंत्री को जाना ही पड़ता है। बिन्नी के साथ चार विधायक हैं।े
  7. वैसे केजरीवाल खुद मुख्यमंत्री नहीं रहना चाहते वे ऐसा कुछ करना चाहते हैं जिससे कि वे लोकसभा चुनाव के पहले लोगों की संवेदना बटोर सकें। यदि राजनीतिक लाभ के लिए संविधान की शपथ भी सडक़ पर आती है तो आने दो।

लाल किले से (भाग-११) केजरीवालजी, दिल्ली के मुख्यमंत्री की औकात ऐसे भी किसी बड़े शहर के महापौर से ज्यादा नहीं है, केन्द्रीय गृहमंत्री ही होते हैं दिल्ली के असली मुख्यमंत्री


लाल किले से (भाग-११)

केजरीवालजी, दिल्ली के मुख्यमंत्री की औकात ऐसे भी किसी बड़े शहर के महापौर से ज्यादा नहीं है, केन्द्रीय गृहमंत्री ही होते हैं दिल्ली के असली मुख्यमंत्री

पूर्ण राज्य का दर्जा मिलते ही दिल्ली का मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री के बाद देश का सबसे ताकवर नेता हो जाएगा इसलिए दिल्ली सरकार सदैव नख और दंत विहीन रहेगी।

 

 

भले ही केन्द्रीय सूचना और सूचना प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी कहें कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और मंत्रियों का धरने पर बैठना असंवैधानिक है और इससे कुछ होने वाला नहीं है। कुछ लोग उन्हें अराजक ता का सूत्रधार बता रहे हैं। पर एक बात तो है कि केजरीवाल के इस धरने के साबित हो गया कि दिल्ली राज्य के मुख्यमंत्री की हैसियत किसी शहर के महापौर से ज्यादा नहीं है। इसलिए उनके इस धरने का मकसद दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलवाना ज्यादा नजर आ रहा है। मजेदार बात यह है कि वे इस बात को अभी कह नहीं रहे हैं।
इसके तीन कारण हैं। पहला कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं है। दूसरा कानून व्यवस्था संभालने वाली पुलिस भी केन्द्रीय गृह मंत्रालय के अधीन रहती है। तीसरा और अंतिम ये कि दिल्ली विधानसभा को कानून पास करने के बाद केन्द्रीय गृह मंत्रालय से अनुमति लेनी पड़ती है। इससे यह भी पता चलता है कि दिल्ली राज्य के पास राजदंड या पुलिस नहीं है। यानी वह बिना दांत के शेर के समान है। राज्य सत्ता में दंड यानी भय यानी पुलिस का अहम रोल है। यही राजसत्ता की ताकत का आधार है। जब यही नहीं था तो दिल्ली पुलिस ने भी केजरीवाल के मंत्रियों को भाव नहीं दिए हैं और इसी हताशा में केजरीवाल आज धरने पर बैठ गए।
दिल्ली में १५ साल शीला दीक्षित मुख्यमंत्री रहीं इस दौरान आखिरी दस साल केन्द्र में  कांग्रेस का शासन था इसलिए पुलिस उनकी सुनती थी अब विरोधी दल का शासन है इसलिए दिल्ली पुलिस सुन नहीं रही। केन्द्र सरकार कभी भी नहीं चाहेगी कि वह दिल्ली से अपना नियंत्रण हटाए। पूर्ण राज्य की स्थिति में केन्द्र और राज्य में सीधे टकराव हो सकता है।
पुलिस रहित दिल्ली सरकार के हालात दिल्ली नगर निगम से ज्यादा नहीं हैं। यानी टैक्स वसूलो और जनता को सुविधाओं दो। बिजली, पानी, शिक्षा, परिवहन, रोड, उदय़ोग विभाग में भी काम करने के लिए काफी  स्कोप है। पर सत्ता की ताकत का पता  पुलिस के बगैर नहीं लगता। आपका रौब भी इसी में है कि पुलिस आपको कितना सलाम ठोकती है। पुलिस के बगैर दिल्ली राज्य ऐसा है जैसे बिना सिंदूर के दुल्हन।
दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने में सबसे बड़ी मुश्किल है वीआईपी सुरक्षा। वीआईपी सुरक्षा कौन को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं।  यह बात भी आई कि वीआईपी सुरक्षा के अलावा पुलिस का नियंत्रण दिल्ली सरकार को दे दिया जाए। दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देेने में एक बड़ी दिक्कत यह है कि अगर दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिल गया तो दिल्ली का मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री के बाद देश का सबसे ताकवर नेता हो जाएगा। कोई प्रधानमंत्री नहीं चाहता कि उसके पद की गरिमा से थोड़ा ही कम वाला व्यक्ति दिल्ली में रहे। नेताओं को यह भी डर है कि पूर्ण राज्य का दर्जा मिलने पर पुलिस राज्य सरकार के मातहत हो जाएगी। ऐसी दशा में दिल्ली राज्य और केन्द्र में अलग दलों की सरकार होने पर बड़े टकराव की नौबत आ सकती है।  इसे ही देखते हुए दिल्ली की सरकार को नख और दंत विहीन रखा गया है।

दिल्ली सरकार को दोहरी रिपोर्टिंग में लाए

इसका एक समाधान है कि दिल्ली पुलिस को कारपारेट हाउस की तरह वर्टिकल एंड यूनिट रिर्पोटिंग सिस्टम के तहत लाया जाए।  इसका मतलब है कि वह केन्द्र और राज्य दोनों का रिपोर्ट करे। आफिसियल तौर पर वह केन्द्र के अधीन ही रहेगी लेकिन दिल्ली की रोजाना की कानून-व्यवस्था की स्थिति के लिए वह मुख्यमंत्री के अधीन राज्य के गृह विभाग को रिपोर्ट करेगीे। नियुक्ति, पोस्टिंग और अन्य मसलों के लिए एक समन्वय समिति बनाई जाए।

तो असली मुख्यमंत्री कौन

पिछले दिनों पूर्व गृह सचिव आरके सिंह ने गृहमंत्री शिंदे पर आरोप लगाए थे कि दिल्ली पुलिस में पोस्टिंग उन्हीं के इशारे पर होती है और उनके बगैर दिल्ली पुलिस में पत्ता भी नहीं हिलता। इस लिहाज से दिल्ली के असली मुख्यमंत्री तो केन्द्रीय गृहमंत्री होते हैं और वे एलजी यानी लेफ्टिनेंट गर्वनर के माध्यम से अपनी सरकार चलाते हैं। अभी ये जिम्मा शिंदे के पास हैं यानी दिल्ली के असली मुख्यमंत्री सुशील कुमार शिंदे हैं। इसलिए केजरीवालजी इसे आप जितना जल्दी समझ जाएं अच्छा है।

रविवार, 19 जनवरी 2014

लालकिले से (भाग-10) मंदिर वाली पार्टी मंडल की राह पर


लालकिले से  (भाग-10)

मंदिर वाली पार्टी मंडल की राह पर

गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और अब राजस्थान में सामान्य और ओबीसी कांबीनेशन की सफलता के बाद 2014 के लोकसभा चुनाव के केन्द्र में होगा यह समीकरण। प्रधानमंत्री के उम्मीदवार मोदी ओबीसी तो अध्यक्ष राजनाथसिंह सामान्य वर्ग से।

मीडिया वालों को या तो न्यूजसेंस नहीं है या फिर उन्होंने किसी दबाव में ऐसा किया। दरअसल नई दिल्ली के रामलीला मैदान में भाजपा की राष्ट्रीय परिषद की बैठक का सभी चैनलों ने सीधा प्रसारण दिखाया। जब विश्लेषण की बारी आई तो सभी चैनल मुद्दों से भटकते नजर आए। कांग्रेस पर राजनीतिक हमला और देश के भविष्य का विजन प्लान अपनी जगह पर महत्वपूर्ण थे लेकिन इसके बीच मोदी एक बड़ी राजनीति खेल गए। इसे कोई भी चैनल या विश्लेषक नहीं पकड़ पाया। मोदी ने कांगे्रस पर राजनीतिक हमला बोलते हुए बड़ी ही चतुराई से ओबीसी प्रधानमंत्री का कार्ड खेल दिया। अभी तक यह बात दबे-छुपे तरीके से ही चल रही थी। आज मोदी ने राहुल और कांग्रेस पर नाम लिए बिना कहा कि वे नामदार हैं, पिछड़ी जाति में पैदा हुए व्यक्ति के खिलाफ चुनाव लडऩा उनकी शान के खिलाफ है। मोदी के विरोधियों और समर्थकों के लिए भी यह एक बड़ी राजनीति बहस का विषय था। खबर भी बड़ी थी। मतलब मंदिर वाली पार्टी मंडल की राह पर पर आ गई है। लेकिन चैनलों से न्यूज और विषय दोनों गायब।
या तो चैनल वाले इस खबर को पकड़ नहीं पाए या जानबूझकर इस खबर को दबाते रहे। खबर दबाने का शक इसलिए है कि शाम को दिल्ली के चैनलों पर वही पुराना घिसे- पिटे केजरी और सुनंता के टेप चलने लगे। मंडल आंदोलन के बाद यह देश में मोदी की ओर से चला गया सबसे बड़ा ओबीसी मूव था।

देश में जनसंख्या का जातीय समीकरण

यदि जनसंख्या के हिसाब से बात करें तो मंडल आयोग की 1980 की सिफारिसों के अनुसार देश में 52 प्रतिशत ओबीसी आबादी है। यानी जैसे महिलाओं को आधी आबादी कहा जाता है वैसे भारत में भी ओबीसी वर्ग को भी आधी आबादी कहा जा सकता है। लेकिन मंडल के 26 साल बाद हुए नेशनल सेम्पल सर्वे आर्गनाइजेशन के आंकडों के अनुसार देश में ओबीसी की आबादी घटकर 41 फीसदी हो गई है। खैर इस आंकडों को लेकर विवाद भी हुआ। एनएसएसओ के २००६ के आंकडों के अनुसार देश की आबादी में ४१ प्रतिशत ओबीसी, २० प्रतिशत एससी और ९ प्रतिशत एसटी और शेष अन्य वर्ग के हैं। अन्य में 21 फीसदी सवर्ण जातियां और शेष 9 फीसदी मुस्लिम हैं। ओबीसी की कुल आबादी में से 75 फीसदी , यूपी, बिहार, उड़ीसा,झारखंड, बंगाल, राजस्थान, हरियाणा, राजस्थान, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में रहती है। यूपी और बिहार के मुस्लिम यादव समीकरण के खिलाफ भी समान्य और ओबीसी का काम्बीनेशन अब दांव पर है।
अगर हम मोदी के टार्गेट वोटर ग्रुप को देखें तो उसका फोकस 41 फीसदी ओबीसी और 21 फीसदी सवर्ण वोटों पर है। यानी कुल 62 फीसदी आबादी पर फोकस। एससी, एसटी और मुस्लिमों में जो उनका वोट है वो तो है ही। गुजरात, मध्यप्रदेश  और छत्तीसगढ़ में भाजपा की लंबे समय से सरकार बने रहने का एक कारण ओबीसी वर्ग है। इन राज्यों में मुख्यमंत्री या प्रदेशाध्यक्ष में से एक ओबीसी का अनिवार्य रूप से रहता है।

खाम थ्योरी के खिलाफ सामान्य और ओबीसी का गठजोड़

दरअसल गुजरात में कांग्रेस की माधवसिंह सोलंकी की खाम थ्योरी के खिलाफ आरएसएस ने ओबीसी और सामान्य वर्ग के गढजोड़ की थ्योरी चलाई थी। इसीके कारण भाजपा वहां सत्ता में आई। खाम की स्पेलिंग के एच ए एम में के मतलब क्षत्रिय, एच का मतलब हरिजन, ए मतलब आदिवासी और एम का मतलब मुस्लिम है। इससे आधार पर गुजरात में कांग्रेस ने एक छत्र राज्य किया। आरएसएस ने खाम थ्योरी के खिलाफ सामान्य और ओबीसी का कांबीनेशन तैयार किया । यह सफल रहा। कारण कि खाम थ्योरी से कांग्रेस २० प्रतिशत एससी, ९ प्रतिशत एसटी, 9 प्रतिशत मुस्लिम और 1 प्रतिशत क्षत्रिय यानी कुल 39 प्रतिशत जनसंख्या पर फोकस करती थी। ओबीसी के लोग भी वोट देते थे लेकिन फोकस खाम पर ही रहता था। आरएसएस ने पटेलों को साथ लेकर कांग्रेस की खाम थ्योरी के खिलाफ ओबीसी वर्ग को संगठित किया। यानी 39 प्रतिशत के खिलाफ 62 फीसदी लोगों की राजनीति। इसलिए गुजरात में लगातार भाजपा सरकार में आ रही है।

गुजरात के बाद मध्यप्रदेश में हुआ प्रयोग


  1. मध्यप्रदेश में यह प्रयोग पहले उमा भारती और फिर शिवराजसिंह चौहान के साथ आरंभ हुआ। दोनों ही मुख्यमंत्री ओबीसी से आते हैं। इनके समय अध्यक्ष पहले प्रभात झा और अभी शिवराजसिंह चौहान सवर्ण जाति के हैं।
  2. छत्तीसढ़ में मुख्यमंत्री डा रमनसिंह सामान्य वर्ग के हैं तो प्रदेशाध्यक्ष रामसेवक पैकरा एसटी के हैं। कारण कि ट्रायबल बहुल राज्य है।
  3. राजस्थान में वसुंधरा सवर्ण वर्ग की हैं तो अब नया अध्यक्ष ओबीसी से ही बनेगा। चुनाव में वसुंधरा ही पार्टी की प्रदेशाध्यक्ष थीं।
  4. आगामी लोकसभा चुनाव को ही देख लें प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी ओबीसी हैं तो भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथसिंह सामान्य वर्ग के हैं।
  5. गुजरात में मोदी के साथ अध्यक्ष पुरूषोत्तम रूपाला और वर्तमान में आरसी फलदू हैं।