रविवार, 15 सितंबर 2013

गुगल पर मोदी को मिले १अरब हिट़स, ओबामा को पीछे छोड़ा







नरेन्द्र मोदी ने अमेरिका वालेओबामा भाई साहब की भी नींद उड़ा दी है। गूगल पर १अरब से अधिक हिट लेकर मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति को पीछे छोड़ दिया है। इसके पहले सर्र्वाधिक हिट्स का रिकार्ड ओबामा के नाम था। इससे इस बात का पता चलता है कि साइबर स्पेस में मोदी काफी लोकप्रिय हैं। इससे उन्हें युवाओं को लुभाने में काफी मदद मिलेगी।
दूसरा यह गुगल हिट ओबामा के दिल पर इसलिए भी हिट करेगी कि अमेरिकी प्रशासन के प्रवक्ता ने एक दिन पहले ही कहा था कि मोदी को वीजा नियमों में छूट नहीं मिलेगी। उन्हें वीजा के लिए सामान्य लोगों की तरह ही आना होगा। उल्लेखनीय है कि गुजरात दंगों के बाद बने माहौल के बाद से अमेरिका उन्हें वीजा नहीं दे रहा था। रेवाड़ी में हुई पूर्व सैनिक रैली में मोदी ने सिर्फ सिलेक्टिव आतंकवाद पर कार्रर्वाई करने के लिए अमेरिका का नाम लिए बगैर उसे आड़े हाथों लिया। इशारा साफ था कि अमेरिका सिर्फ उतने आतंकवाद पर ही कार्रवाई करता है जिससे उसके हित प्रभावित होते हैं। बाकी दुनिया के आतंकवाद से उसे कोई लेना देना नहीं है।
अब अगर मोदी भविष्य में प्रधानमंत्री बन गए तो फिर वीजा का कोई मुद्दा रहेगा ही नहीं। पर गुगल ने ओबामा को संकेत कर दिया है कि मोदीआपसे भी ज्यादा लोकप्रिय हैं।
दूसरा यह गुगल हिट ओबामा के दिल पर इसलिए भी हिट करेगी कि अमेरिकी प्रशासन के प्रवक्ता ने एक दिन पहले ही कहा था कि मोदी को वीजा नियमों में छूट नहीं मिलेगी। उन्हें वीजा के लिए सामान्य लोगों की तरह ही आना होगा। उल्लेखनीय है कि गुजरात दंगों के बाद बने माहौल के बाद से अमेरिका उन्हें वीजा नहीं दे रहा था। रेवाड़ी में हुई पूर्व सैनिक रैली में मोदी ने सिर्फ सिलेक्टिव आतंकवाद पर कार्रर्वाई करने के लिए अमेरिका का नाम लिए बगैर उसे आड़े हाथों लिया। इशारा साफ था कि अमेरिका सिर्फ उतने आतंकवाद पर ही कार्रवाई करता है जिससे उसके हित प्रभावित होते हैं। बाकी दुनिया के आतंकवाद से उसे कोई लेना देना नहीं है।
अब अगर मोदी भविष्य में प्रधानमंत्री बन गए तो फिर वीजा का कोई मुद्दा रहेगा ही नहीं। पर गुगल ने ओबामा को संकेत कर दिया है कि मोदीआपसे भी ज्यादा लोकप्रिय हैं।

भारत ने खींचा अग्रिपथ


चीन, रूस, अफ्रीका और अमेरिका भी अब भारत की मिसाइलों की जद में

भारत ने आज दुनिया के सामने अपना अग्रिपथ खींच दिया। आज सतह से सतह पर मार करने वाली इंटरकांटिनेन्टल बेलिस्टिक मिसाइल आईसीबी अग्रि-5 का दूसरा सफल परीक्षण किया। दो और परीक्षणों के बाद इसे सेना को सौंप दिया जाएगा। अभी इसकी रेंज पांच हजार किलोमीटर बताई जा रही है। दरससल इसकी रेंज सात हजार किलोमीटर के आस- पास है।चीन के आशंका जताई है इसकी रेंज 8 हजार किलोमीटर है । 5 हजार किलोमीटर की रेंज से चीन और अफ्रीका का आधा हिस्सा भारतीय परमाणु मिसाइलों की जद में आ रहा है। भारत जैसे ही इसकी रेंज को आठ हजार किलोमीटर  करेगा अमेरिका, यूरोप और पूरा अफ्रीका इसकी जद में आ जाएगा। इसके बाद अग्रि-6 की योजना है। इसकी रेंज 8 से 10 हजार किलोमीटर है। अग्रि-5 को रेल के डिब्बेनुमा लांचर से कहीं से छोड़ा जा कसता है।
 पांच हजार किलोमीटर रेंज का अर्थ है - अगर हम इस पर डेढ़ टन वजनी परमाणु वारहैड लगाकर छोड़ेगे तो यह पांच हजार किलोमीटर मार करेगी।
सात हजार किलोमीटर रेंज का अर्थ है - अगर हम इस पर डेढ़ टन के बजाय एक टन वजनी परमाणु वारहैड लगाकर छोड़ेगे तो यह साढ़े 6 से सात हजार किलोमीटर मार कर सकती है।

मिसाइल कार्यक्रम लेटलतीफी का शिकार

दरअसल आईसीबीएम बनाने में भारत पहले ही काफी पिछड़ गया था। पहली बार अग्रि मिसाइल का परीक्षण राजीव गांधी के प्रधानमंत्रीकाल में 198९ में ही हो गया था। अमेरिकी  दबाव  के चलते इसके बाकी परीक्षण नहीं हो पाए थे। उस समय अमेरिका इस मिसाइल से काफी परेशान था। कारण कि हिन्द महासागर स्थित उसका सैन्य ठिकाना डियोगार्शिया इस मिसाइल की जद में आ गया। इसके बाद पीबी नरसिंहाराव के प्रधानमंत्री रहते भारत के परमाणु परीक्षण की खबर अमेरिकी अखबार में लीक हो गई थी।  इसके बाद परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम ठंडे बस्ते में चला गया। कुछ दिनों  बाद अग्रि और पृथ्वी मिसाइलों के सामान्य परीक्षण होते रहे। ये 250 से 3000 किलोमीटर तक मार करने में सक्षम थीं।

आईसीबीएम का नाम सूर्या से बदलकर अग्रि-5 

भारत आईसीबीएम मिसाइल का परीक्षण वर्ष 2000 में ही हो जाना था लेकिन इसके लिए हमें लंबा इंतजार करना पड़ा। पहले इसका नाम  सूर्या रखा गया था। एनडीए के शासनकाल में भारत की आवश्यकताओं के हिसाब से मिसाइल कार्यक्रम में परिवर्तन किया गया।
संसद पर हमले के बाद भारत की फौज पाकिस्तान की सीमा पर डटी हुई थी। उस समय हमारे ध्यान में आया कि पाकिस्तान से लडऩे के लिए हमें 250 से हजार किलोमीटर मार करने वाली ही मिसाइलें की चाहिए। उस समय हमारे पास इस रेंज की मिसाइलों की कमी थी। इसी कमजोरी के चलते ही  भारत ने पाकिस्तान पर हमला नहीं किया। तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी ने रूस से बात कर आनन- फानन में इस रेंज की मिसाइलें मंगवाई। इस आशंका के साथ कि अगर पाकिस्तान ने आक्रमण कर दिया तो फिर क्या करेंगे। ये मिसाइलें काफी महंगी आईं थीं। सीएजी की रिपोर्ट में भी इस खरीदी को लेकर आपत्ति आई थी।
इसक े बात भारत ने मिसाइल कार्यक्रम में परिवर्तन किया। अग्रि को परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम बनाया। इसी कड़ी में मिसाइल अग्रि-1 का फिर से परीक्षण किया गया। इसकी विशेषता यह भी थी इसे रेल के डिब्बेनुमा लांचर से कहीं से छोड़ा जा कसता है। सारी मिसाइलों को पुन: नई तकनीकी तौर पर समक्ष बनाया। पहले मिसाइलों को पाकिस्तान के खतरे के हिसाब से तैयार किया। चीन का खतरा अब सिर उठा रहा है तो भारत ने अग्रि-5 का दूसरा परीक्षण किया। स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन की असफलता से भी आईसीबीएम प्रोजेक्ट में देरी हुई है।
यूपीए सरकार को पिछले नौ सालों से सत्ता में है और वह भी इस मामले में गंभीर नहीं दिखती। होना तो यह चाहिए था कि अब तक हमारी सेना के मिसाइल दस्ते को यह मिसाइल मिल जानी थी पर लगता है कि इसके लिए हमें तीन-चार साल और इंतजार करना पड़ेगा।

शनिवार, 14 सितंबर 2013

शाब्दिक अनुवाद की गलती से हिन्दी कानूनन नहीं बन सकी राष्ट्रभाषा

https://www.blogger.com/blogger.g?blogID=518818728602863960#editor/target=post;postID=5996507954110891228

हिन्दी को होना तो था राष्ट्रभाषा लेकिन अनुवाद की गलतफहमियों से यह महज राज काज की भाषा बन कर रह गई है। आज हिन्दी दिवस है। संविधान सभा की ओर से  हिन्दी को देवनागरी लिपि में भारत की official language का दर्जा देने का दिन। 1949 में आज ही के दिन हिन्दी को यह मान्यता मिली । 26 जनवरी 1950 में संविधान लागू हुआ। संविधान के अनुच्छेद-343 में कहा गया  कि  The official language of the Union shall be Hindi in Devnagari script. इसका हिन्दी अनुवाद यूं किया गया कि- संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी। यह सीधा-सीधा शब्दानुवाद है।
विडंबना तो यह है कि भारत का संविधान पहले अंग्रेजी में बनाया गया और फिर उसका हिन्दी अनुवाद किया गया।  The official language of the Union shall be Hindi in Devnagari script   का सही अर्थ यह होना चाहिए कि हिन्दी देवनागरी लिपि में भारत की आधिकारिक भाषा होगी यानी प्रतिनिधि भाषा। इसे हम यूं समझ सकते हैं कि जैसे मनमोहन सिंह भारत के आफिसियल /आधिकारिक प्रधानमंत्री हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि वे सिर्फ प्रधानमंत्री कार्यालय या संसद में बैठने तक ही प्रधानमंत्री रहेंगे। वे घर, बाहर, देश, विदेश कहीं भी जाएं वे भारत के प्रधानमंत्री ही कहलाएंगे। आफिसियल शब्द प्रतिधित्व का बोध करवाता है। इसी तरह official language का अर्थ सिर्फ राज-काज की भाषा नहीं है। यह सवा सौ करोड़ भारतीयों के  प्रतिनिधित्व की भाषा है। राज-काज तो हिन्दी में होगा ही इसके अलावा संसद, विधानसभा और कार्यालयों के बाहर भी हिन्दी आधिकारिक या कानूनी तौर पर संघ यानी भारत की भाषा होनी चाहिए।  हिन्दी भारत की आधिकारिक यानी संवैधानिक रूप से देश की प्रतिनिधि भाषा है। लेकिन केन्द्र सरकारों ने  इसके हिन्दी अनुवाद संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी के मान से इसका अर्थ निकालकर इसे सरकारी काम-काज की भाषा तक सीमित कर दिया।  मसलन हिन्दी जिस सम्मान की हकदार थी वह उसे नहीं मिला। जो लोग हिन्दी बोलते हैं वे तो बोलेंगे ही लेकिन हम अभी तक खामोश हैं। आधिकारिक भाषा का मतलब था कि अगले १५ वर्षो में अंग्रेजी के स्थान पर हिन्दी में ही सारा काम काज होने लगे। इसी भावना से पहले १५ वर्षों तक राजकाज में अंग्रेजी के उपयोग को छूट दी गई थी। बाद में इस छूट को और बढ़ा दिया गया। यह हिन्दी के खिलाफ एक सोची समझी साजिश है। वर्तमान में संसद अंग्रेजी में कानून बनाती है और फिर इसका हिन्दी में अनुवाद होता है। होना यह चाहिए कि पहले कानून हिन्दी में बने और फिर उसका अनुवाद अंग्रेजी में हो। कारण कि भाषा भाव की जननी है। जो भाव हिन्दी में आ सकते हैं वे अंग्रेजी में नहीं ही आ सकते। आ भी गए तो अनुवाद की गलती अर्थ का अनर्थ कर देती है। हिन्दी के साथ ऐसा ही हुआ है। उदाहरण के तौर पर एक गीत की पंक्तियां है कि- राधिके तुने काहे रे बंसरी चुराई..। इसे अगर आप भारत में लोगों का सुनाकर पूछेंगे कि इसका क्या अर्थ तो सामान्य से सामान्य समझ वाला मनुष्य बता देगा कि यह विषय भगवान कृष्ण-राधा और उनके दिव्य प्रेम से जुड़ा हुआ है। दूसरी ओर यही पंक्तियां अनुवाद करके लंदन के लोगों को सुनाई जाएं कि -राधिके वाय केन यू थीप माय फ्लूट। क्या उनके मन में यही भाव आएंगे। नहीं ही आएंगे।  हो सकता है कि उनमें से कोई कह दे कि - सो व्हाट केन आई डू, प्लीस गो टू पोलिस स्टेशन एंड रिपोर्ट हियर।
हाल ही संसद की ओर बलात्कार संबंधी धाराओं में संशोधन करने वाले आपराधिक कानून संशोधन एक्ट-२०१३ का हिन्दी अनुवाद आज हिन्दी दिवस तक केन्द्र सरकार के ईगजट वाले वेब पोर्टल पर नहीं है। हिन्दी गजट वाले विभाग में यह कानून अंग्रेजी में ही खुल रहा है।
तो क्या भारत की संसद हिन्दी के संबंध में अनुवाद में हुए इस महापाप को बदलने का साहस दिखाएगी।
हिन्दी के बारे में संविधान में अंग्रेजी और हिन्दी के अनुच्छेद-३४३ में १९५० में किए गए प्रावधान इस प्रकार हैं।
Article 343. Official language of the Union-
(1) The official language of the Union shall be Hindi in Devnagari script. The form of numerals to be used for the official purposes of the Union shall be the international form of Indian numerals.
(2) Notwithstanding anything in clause (1), for a period of fifteen years from the commencement of this Constitution, the English language shall continue to be used for all the official purposes of the Union for which it was being used immediately before such commencement:
Provided that the President may, during the said period, by order authorise the use of the Hindi language in addition to the English language and of the Devnagari form of numerals in addition to the internationl form of Indian numerals for any of the official purposes of the Union.
(3) Notwithstanding anything in this article, Parliament may be law provide for the use, after the said period of fifteen years, of-  (a) the English language, or (b) the Devnagari form of numerals,
for such purposes as may be specified in the law.
अनुच्छेद ३४३. संघ की राजभाषा--
(१) संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी, संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा।
(२) खंड (१) में किसी बात के होते हुए भी, इस संविधान के प्रारंभ से पंद्रह वर्ष की अवधि तक संघ के उन सभी शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाता रहेगा जिनके लिए उसका ऐसे प्रारंभ से ठीक पहले प्रयोग किया जा रहा था :
परन्तु राष्ट्रपति उक्त अवधि के दौरान, आदेश द्वारा, संघ के शासकीय प्रयोजनों में से किसी के लिए अंग्रेजी भाषा के अतिरिक्त हिंदी भाषा का और भारतीय अंकों के अंतर्राष्ट्रीय रूप के अतिरिक्त देवनागरी रूप का प्रयोग प्राधिकृत कर सकेगा।
(३) इस अनुच्छेद में किसी बात के होते हुए भी, संसद् उक्त पन्द्रह वर्ष की अवधि के पश्चात्‌, विधि द्वारा (क) अंग्रेजी भाषा का, या (ख) अंकों के देवनागरी रूप का,
ऐसे प्रयोजनों के लिए प्रयोग उपबंधित कर सकेगी जो ऐसी विधि में विनिर्दिष्ट किए जाएं।

शनिवार, 7 सितंबर 2013

क्या न्यूज चैनल स्वामी नित्यानंद से माफी मांगेगे



क्या इंटरनेट से इन दोनों से मार्फिग किए फोटो हटेंगे

आसाराम बापू के ताजा तरीन  विवाद के बीच एक सुखद  खबर आई है कि दक्षिण के प्रमुख संत स्वामी नित्यानंद ओर फि ल्मी अभिनेत्री रंजीता मेनन के एक साल पहले तमिल चैनल पर चलाए गए वीडियो क्लिप मार्फड और झूठे हैं। इसके लिए चैनल को एक सप्ताह तक हर दो घंटे में एक बार माफीनामा चलाने का ब्राडकास्टिंग कंटेट कम्पलेन काउंसिल ने आदेश दिया है। इस खबर ने कम से कम बाबाओं की लाज बचा ली। आपको याद दिला दूं कि देश के कई हिन्दी, अंग्रेजीऔर रीजनल  न्यूज चैनलों ने भी बाबा नित्यानंद और अभिनेत्री वाला यह वीडियो क्लिप चलाया था। क्या ये चैनल भी बाबा नित्यानंद और रंजीता से माफी मांगेगे। नैतिकता के आधार पर क्या वे माफी मांगेगे। इस मामले में प्रिंट मीडिया का रिकार्ड अच्छा है। ज्यादातर हिन्दीऔर अंग्रेजी के अखबारों ने इस खबर को जगह दी है। इसके अलावा इन दोनों के इसी क्लिप से बनाए गए हजारों आपत्तिजनक फोटो इंटरनेट पर हैं। क्या इन्हें हटाने के लिए कोई प्रक्रिया प्रारंभ होगी।
 दक्षिण में बाबा नित्यानंद ने हिन्दूओं के धर्मान्तरण के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। इसाई बन चुके हजारों लोगों की वे धर्मवापसी भी करवा चुके हैं। इससे बौखलाएं लोगों ने एक चैनल को मोहरा बनाकर उन्हें अपना शिकार बनाया। इससे यह भी साफ है कि सेवा के नाम गरीब लोगों का धर्मान्तरण कराने वाली संस्थाएं सनातन धर्म के संतों को निशाना बनाने में लगी हुई हैं। इस मामले में बाबा पर जो दाग हटा है उसमें रंजीता की ही प्रमुख भूमिका है। उसने न्याय प्रक्रिया के माध्यम से ही अपने और स्वामीजी पर लगे आरोपों को गलत साबित कर दोषियों को दंड भी दिलवाया।

यह था मामला

पीटीआई के अनुसार इस मामले में रंजीता ने कर्नाटक हाईकोर्ट में एक रिट लगाई थी। इसमें बताया गया था कि पिछले साल २१ मार्च को स्टार विजय टीवी चैनल ने क्या हुआ, अपराध और पृष्ठभूमि नामक शीर्षक से उसके वीडियो प्रसारि किए थे। इसमें उसे संत स्वामी नित्यानंद के साथ दिखाया गया था।

उच्च न्यायालय ने दिए निर्देश


उच्च न्यायालय ने न्यूज ब्राडकास्टिंग स्टेंडर्ड अथारिटी (एनबीएसए) को निर्देश दिए कि वे रंजीता की बात को सुनें। चूंकि यह मामला मनोरजंन चैनल से जुड़ा हुआ था इसलिए सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने इस मामले को ब्राडकास्टिंग कंटेट कम्पलेन काउंसिल (बीसीसीसी) को भेज दिया। इसके प्रमुख दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एपी शाह हैं।

अभिनेत्री रंजीता ने कहा

बीसीसीसी के सामने रंजीता ने कहा कि टीवी चैनल पर दिखाएं गए क्लिप्स मार्फड हैं और उनका हकीकत से कोई लेना-देना नहीं है। कार्यक्रम तथ्यहीन था। अफवाहों और असत्यापित बयानों के आधार पर उसके क्लिप्स को आधार बनाया गया था। अभिनेत्री का यह भी कहना था कि इस बारे में उससे चैनल के किसी भी प्रतिनिधि ने बात नहीं की और लगातार उसके नाम और क्लिप का इस्तेमाल किया और लोगों को इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित किया

https://www.facebook.com/manoj.binwal.5बीसीसीसी का आदेश

बीसीसीसी ने अपने आदेश में कहा कि चैनल ने स्वीकार किया है कि क्लिप मार्फ की गई थी। अपने दर्शकों को जागरूक बनाने के लिए उन्होंने इसे दिखाया
बीसीसी ने चैन के पक्ष को अंसतोषकारक मानते हुए आदेश दिया कि चैनल सात दिन तक हर दो घंटे में माफी के स्क्राल तमिल और अंग्रेजी भाषा में चलाएं। साथ ही चैनलों को चेताया कि के क्लिप्स और अन्य तथ्यों की प्रामाणिकता की जांच किए बगैर प्रसारित नहीं करें।












बुधवार, 4 सितंबर 2013

बंजारा ने गुरू के लिए भगवान से लिया पंगा




सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस में मुंबई की तालोजा जेल में बंद गुजरात के पूर्व डीआईजी डीजी बंजारा की १० पेज की चिट्ठी और आशाराम बापू की गिरफ्तारी में संबंध है। बापू की गिरफ्तारी से उनके अनन्य भक्त बंजारा इतने आहत हुए कि उन्होंने अपने गुरू यानी आसाराम बापू को बचाने के लिए अपने भगवान नरेन्द्र मोदी से पंगा ले लिया।
१.   आशाराम बापू के अनन्य भक्त हैं बंजारा। बंजारा आसााराम के इतने बड़े भक्त हैं कि जब वे बनासकांठा में पोस्टेड थे तो वे साबरमती स्थित बापू के आश्रम की गाय का दूध ही मंगवाकर पीते थे। साबरमती से बनासकांठा लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर है।
२.   कथित रेप केस में आसाराम बापू का भाजपा के कई नेता समर्थन कर रहे थे। मोदी ने उन्हें आसाराम बापू का समर्थन करने से रोका। इसके बाद मोदी ने आसाराम बापू के आश्रमों के अतिक्रमणों की जांच के लिए गुजरात के सभी जिला कलेक्टरों का आदेश दिए हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय है मोदी और बापू के बीच पिछले तीन साल से संबंध ठीक नहीं चल रहे हैं। साबरमती आश्रम में दो बच्चों की मौत के बाद ये रिश्ते और खराब हो गए थे।
३.   मोदी की एक खास थ्योरी के अनुसार महिलाएं के वोट उनके प्रधानमंत्री बनने के  लिए काफी महत्वपूर्ण हैं इसलिए उन्होंने  कथित रेप केस में बापू का खुला समर्थन करने वाले भाजपा नेताओं को रोका। गुजरात में वे इसी थ्योरी के सहारे हिट हैं। कई दूसरे भाजपा शासित राज्यों में  भी इस थ्योरी को फालो किया जा रहा है।
४.   आसाराम बापू के सहारे और उनके मार्गदर्शन में ही डीजी बंजारा ने जेल में ६ साल से ज्यादा समय काट दिया। बापू की गिरफ्तारी और मोदी की बेरूखी से बंजारा बुरी तरह टूट गए। बंजारा ने इस्तीफा देकर १० पेज की चिट्ठी लिखी है। 

मतलब साफ है-


  •  इस  चिट्ठी का मतलब साफ है कि मोदी बापू के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करे उल्टे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन कर।
  • जैसे मोदी ने अमित शाह को बाहर निकलवाया वैसे उन्हें यानी बंजारा को भी बाहर निकलवाएं। इसके बाद उनके विश्वासपात्र पुलिस अधिकारियों को एक-एक करके जेल से बाहर लाएं।

  • ऐसा नहीं हो तो कम से कम लोकसभा का चुनाव लड़वा दें।

अन्यथा

बंजारा एनकाउंटर और गुजरात दंगों से जुड़े कई राजों से परदा उठा देंगे।
लोकसभा चुनाव तक देखिए ऐसा ही कुछ घट सकता है।

यानी

गुरूभक्ति की भी यह एक बड़ी मिसाल है।
गेंद अब भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री बनने के दावेदार नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के पाले में है।

गुरुवार, 29 अगस्त 2013

युवाओं में तकनीक से आएंगे गोविन्दा ..




 वसदेवसुतं देवं कंस चार्णूरमर्दनम् ।

देवकी परमानंदम् कृष्णं वंदे जगद्गुरुम् ।।

आठ की महिमा


वां अवतार भगवान विष्णु ने कृष्ण के रूप में लिया।
वीं संतान थे देवकी और वसुदेव की भगवान कृष्ण ।
वीं तिथि यानी अष्टमी को अवतार लिया भगवान कृष्ण ने।

तथ्य

आज पांच हजार ५६ वर्षों के बाद श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर कृष्ण जन्म की स्थितियां संकेत कर रही हैं कि तारणहार आने वाला है।
द्वापर में जब कृष्ण के अवतार लिया था तब भाद्र कृष्णपक्ष की अष्टमी, बुधवार, रोहिणी नक्षत्र, वृषभ लगन, उच्च का चंद्रमा, सिंह राशि का सूर्य था।
आज भी भाद्र कृष्णपक्ष की अष्टमी, बुधवार, रोहिणी नक्षत्र, वृषभ लगन, उच्च का चंद्रमा, सिंह राशि का सूर्य है। इसके अलावा अन्य छोटे संयोग भी मिल रहे हैं।

विचार और शुभकामनाएं


फेसबुक के सभी मित्रों को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की शुभकामनाएं। इन्हीं शब्दों के साथ कि इस बार तारणहार के आने के पूरे संकेत तो हैं लेकिन वे इस बार नहीं आएंगे। खुद भगवान ने कहा है कि कलयुग में देह धारण नहीं करूंगा लेकिन संगठित शक्ति के रूप में अवतार लूंगा। यानी इस बार हर भारतीय को अपने आपको हर दृष्टि से श्रेष्ठ बनाना होगा। जागरूक होना होगा। वैसे श्रीमद् भागवत में लिखा है कलियुग में भगवान कल्कि के रूप में अवतार लेगें। दूसरी ओर भगवान स्वंय कहते हैं कि कलियुग मैं मनुष्य के रूप में अवतार नहीं लूंगा। कल्कि शब्द कल से बना है जिसका कि अर्थ होता है मशीन । यह कलियुग यानी मशीनी युग है, तकनीक का युग है। यानी मशीन या तकनीकी से जुड़ी कोई ताकत भारत की तारणहार बनेगी। वर्तमान में भारत के युवा जिस तरीके से तकनीक के क्षेत्र में आगे हैं उससे लगाता है कि कल्कि का अवतार किसी तकनीक से और वह भी युवाओं के माध्यम से निकलेगा और उसी के दम पर भारत फिर से दुनिया का सिरमौर होगा।
श्रीकृृष्ण जन्माष्टमी के संकेत सत्ताओं के बदलाव और रोहिणी नक्षत्र और वृषभ राशि का शुभ संयोग समृद्धि और स्थिरता का संकेत दे रहा है।

आप ये करें


तो आज जन्माष्टमी की रात १२.१२ मिनट पर भगवान श्रीकृष्ण का पंचामृत यानी दूध, दही, धी, शहर और शक्कर से अभिषेक करें। उसके बाद लड्डू गोपालजी का श्रृंगार  करें। माखन और मिश्री का भोग लगाएं। विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। गुरूवार को पुन: भगवान को स्नान करवाकर उन्हें नए वस्त्र पहनाएं और बच्चों को खिलौने और चाकलेट बांटे। सारी मनोकामनाएं पूरी होंगी।




जय श्रीकृष्ण

बुधवार, 13 फ़रवरी 2008

मुम्बई सिर्फ मेहनतकशों की


सारी दुनिया ग्लोबल विलेज की अवधारणा की ओर बढ़ रही है। ऐसे में मुम्बईया ठाक रे के ठस दिमागों में प्रान्तवाद का जिन्न जाग रहा है। क्या मुम्बई मराठियों की है तो सवाल हां हो सकता है लेकिन जब सवाल यह हो कि क्या मुम्बई सिर्फ मराठियों की है तो जवाब हर हाल में ना ही होगा। मुम्बई के विकास में मराठियों के अलावा गुजरातियों, मारवाड़ियों, यूपी बिहार के भैय्याओं के साथ-साथ सारे देश के लोगों का हाथ। निसंदेह मुम्बई के विकास में मराठियों का योगदान है पर जब हम उसकी तुलना प्रांतवाद के आधार पर दूसरे प्रांत से आए लोगों से करते हैं (जो कि नहीं की जानी चाहिए) तो पता चलता है कि उनका योगदान अन्य लोगों की तुलना में काफी कम है। दरअसल मध्यमवर्गीय और नौकरी पेशा वाली मानसिकता के कारण अधिकांश मराठी लोग मध्यमवर्गीय ही बनकर रह गए है। दूसरी ओर अन्य प्रांतो से आए लोगों ने छोटे मोटे बिजनेस किए, एक कमरे में परिवार के साथ रहे, मुफलिसी में भी दिन बिताए, फुटपाथों पर भी सोए, खाली बड़ा पाव खाकर भी महीनों निकाल दिए। इसी संघर्ष की बदौतल लाखों लोगों के दिन फिर गए। कोई धीरूभाई अंबानी बन गया तो कोई अमिताभ बच्चन, कोई पृथ्वीराज कपूर बना तो कोई शाहरूख खान। ऐसे लाखों उत्तर भारतीय या महाराष्ट्र के बाहर के लोगों कि किस्मत मुम्बई ने बदली है। ऐसे लोग मुम्बादेवी की इस पावन धरा को सलाम करते हैं लेकिन मुम्बई की जमीन पर गिरे उनके पसीने की बूदों और संघर्ष की रेखाओं को हम शायद भूल गए है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि मुम्बई की धरती की खासियत है जो उस पर अपने पसीने की बूंदे गिराता है और संघर्ष की रेखाएं मुम्बई के भाल पर खींचता है उसे वह सिर माथे बैठाती है। फिर वह उत्तर भारतीय हो या मराठी। दरअसल मुम्बई है उन मुम्बईकरों की जो मुम्बई को अपनी मेहनत से सीचते हैं, उसके लिए जीते हैं और मरते हैं, फिर वह मराठी हो या उत्तरभारतीय, बंगाली बंधु हो गुजराती भाई। तो फिर मुम्बई और महाराष्ट्र को ठाकरे के ठसपने के लिए क्यों जलना चाहिए।
राज ठाकरे से एक सवाल अगर सारे देश के लोग शेयर मार्केट में पैसा लगाना बंद कर दें या शेयर मार्केट को कहीं और शिफ्ट कर दिया जाए तो मुम्बई कितनी मुम्बई रहेगी।
मुम्बई किसकी: एक नजर मेंव्यापार गुजरातियों के हाथ में : 1950 में सौराष्ट्र को छोड़कर पूरा गुजरात मुम्बई स्टेट का हिस्सा था, लिहाजा मुम्बई में छोटा-मोटा नहीं बहुत बड़ा गुजरात बसता है। सार बिजनेस उन्ही के हाथों में है। मुम्बई की तीन लोकसभा, 15 विधानसभा क्षेत्रों, शेयर मार्केट और व्यापार में गुजरातियों का बोलबाला है।
शेयर मार्केट : शेयर मार्केट में लगने वाला 90 प्रतिशत पैसा महाराष्ट्र के बाहर का होता है। शेयर मार्केट में गुजरातियों का बोलबाला है। बिजनेस में भी मारवाड़ियों के साथ गुजरातियों की तूती बोलती है।
कारपोरेट जगत में देश भर की धू : देश की अधिकतर बड़ी प्राइवेट कंपनियों से मुख्यालय मुम्बई में है। वहा काम करने वाले अधिकत लोग देश के विभिन्न प्रांतों के हैं।
फिल्मी दुनिया उत्तर के कब्जे मे : पंजाब, दिल्ली, यूपी, बिहार और मध्यपद्रेश के लोगों ने फिल्मी दुनिया में नाम कमाया। पृथ्वीराज कपूर से अनिल कपूर तक, अमिताभ से शत्रुघन्न सिन्हा और शाहरूख खान से राजपाल यादव, सलीम खान से सलमान खान, गुलजार से तक सभी उत्तर भारतीय है। फिल्मी दुनिया में काम करने वाले, स्ट्रगल करने वाले यादातर लोग उत्तर भारत के ही होते हैं।
छोटे मोटे कामों में भैय्याओं का बोलबाला : टैक्सी ड्रायवरी, दूध, सब्जी, चाय,बड़ापाव, गुमटी के छोटे मोटे बिजनसे हााम, धोबी, मिस्त्री और मजदूरी जैसे कामों उत्तर भारतीयों खासकर यूपी और बिहार के लोगोंने अपनी घाक जमा ली।इसके पीछे सामाजिक और आर्थिक कारण यादा जवाबदार हैं। यूपी और बिहार में देश की कुल आबादी के लगभग 19 प्रतिशत लोग रहते हैं। रोजगार की तलाश और गरीबी से निजात पाने के लिए यूपी और बिहार के लोग हर प्रांत में फैले मिल जाएंगे। जैसे जैसे मुम्बई का आकार बढ़ता गया सेवा और मजदूरी के लिए लोगों की जरूरत बढ़ती गई। कारण कि आम मराठी पढा लिखा होने की वजह से आज से 25 साल पहले छोटे-मोटे कामों के बजाय नौकरी को प्राथमिकता देता आया था। लिहाजा मुम्बई में मौजूद कुछ भैय्याओं ने अपने नजदीकी लोगों को मुम्बई में लाना शुरु किया और देखते ही देखते पिछले तीन चार दशक में मुम्बई के सेवा और फुटपाथी बिजनेस में भैय्याओं का बोलबाला हो गया।
चलते-चलते : भाई गिरी में भी मराठी पीछे है। दाउद, छोटाशकील---------------------------