बुधवार, 15 जनवरी 2014

लालकिले से (भाग-६) टोपी की नहीं टोपी पहनाने की राजनीति


लालकिले से  (भाग-६)

टोपी की नहीं टोपी पहनाने की राजनीति

टोपी नहीं लगाने वाले प्रधानमंत्रियों ने देश को ज्यादा टोपी पहनाई है, कांग्रेस के टोपी नहीं पहनने वाले नेताओं ने ६ साल में ७ प्रधानमंत्रियों की कुर्सी छीनकर देश पर चुनाव थोपे हैं। आजादी के बाद देश में कार्यवाहक प्रधानमंत्री सहित कुल १४ व्यक्ति देश की कुर्सी पर बैठे हैं। इनमें से ७ टोपी लगाने वाले, १ पगड़ी पहनने वाला और ६ टोपी नहीं पहनने वाले थे या हैं। मनमोहनसिंह की आस्था को देखते हुए मैं उनके   बारे में मैं कोई टिप्पणी नहीं करना चाहूंगा।  अब कांग्रेस के निशाने पर अरविंद केजरीवाल हैं। अब उन्होंने उसे समर्थन की टोपी पहनाई है। श्रृंखला लालकिले से के भाग ६ में प्रस्तुत है जनता को टोपी पहनाने की राजनीति, टोपी के समाजशास्त्र और राजनीति शास्त्र के साथ।
१.    भारत के प्रधानमंत्रियों में पं. नेहरू, गुलजारीलाल नंदा, लालबहादुर शास्त्री, मोरारजी देसाई, चौधरी चरणंिसंह, वीपी सिंह टोपी लगाते थे। सरदार मनमोहनसिंह पगड़ी पहनते हैं। ये इन लोगों की वेशवूषा का अभिन्न हिस्सा था या है।
२.    इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, चंद्रशेखर, पीबी नरसिंहाराव, एचडी देवेगौडा, इंदकुमार गुजराल और अटल बिहारी वाजपेयी ने वेशवूषा के तौर पर कभी टोपी नहीं पहनी। कांग्रेसी नेताओं ने किसी खास मौके पर गांधी टोपी लगाई तो वाजपेयी संघ के कार्यक्रमों में काली टोपी पहने नजर आए।
३.    २०१४ के चुनाव में प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में से एक भाजपा के नरेन्द्र मोदी भी टोपी नहीं पहनते। संघ के कायक्रमों में वे अवश्य काली टोपी में नजर आते हैं। इसके अलावा उन्हें पगड़ी में फोटो  खिंचाने का शौक है। उनके पगड़ी में जितने प्रकार के फोटो हैं उतने शायद ही किसी दूसरे राजनेता के हों। एक बार तो वे हैट में भी नजर आए थे। अन्ना आंदोलन के बाद अरविंद केजरीवाल भी टोपी लगाने लगे हैं। कांग्रेस के दावेदार राहुल गांधी भी कांग्रेस के खास कार्यक्रमों में ही गांधी टोपी में नजर आते हैं।
अन्ना आंदोलन के बाद गांधी टोपी (वास्तव में  यह कुमाउंनी या खानदेशी टोपी है ) राजनीति के केन्द्र में है। हर किसी में टोपी लगाने की होड़ मची हुई। पर लोग यह बात भूल चुके हैं टोपी, पगड़ी या सांफा हिन्दुस्तानी समाज में सदैव से ही सम्मान का प्रतीक रही है। इसलिए यह कहावत भी बनी कि उसकी टोपी या पगडी़ मत उछालो। आजादी के आंदोलन और आजादी के बाद ८० के दशक तक टोपी वाले नेताओं ने देश को संभाला। उसके बाद दौर आरंभ हुआ बगैर टोपी वाले नेताओं का, वीपी सिंह के अपवाद को छोडक़र। इन्होंने देश को टोपी पहनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वाजपेयी अपवाद हो सकते हैं। देश को आजाद हुए ६६ साल हो चुके हैं। इसमें कांग्रेस ने ५३ साल और गैर कांग्रेसी दलों में १३ साल राज किया। इन १३ में से भी ६ साल भाजपा के अटलबिहारी वाजपेयी ने राज किया। बाकी के ६ सालों में कांग्रेस ने मोराराजी देसाई (१९७९), चौधरी चरणसिंह(१९८०), वीपी ंिसहं(१९९०), चंद्रशेखर (१९९१), अटलबिहारी वाजपेयी(१९९६), एचडी देवेगौड़ा (१९९७)और इंद्रकुमार गुजराल (१९९८)की सरकार गिराईं। यानी ६ साल में ७ सरकार गिराईं। इनमें से चार प्रधानमंत्री चौधरी चरणसिंह , चंद्रशेखर, देवेगौड़ा और गुजरात सीधे-सीधे कांग्रेस के  समर्थन की बैशाखी पर चल रहे थे। मोरारजी, वीपी ंिसंह और अटलबिहारी वाजपेयी को गिराने का खेल कांग्रेस ने ही रचा था। वीपी सिंह सरकार को गिराने में भाजपा भी जिम्मेदार थी
यानी सत्ता पाने के लिए कांग्रेस ने सदैव जनता को टोपी पहनाई है। कभी भी किसी गैर कांग्रेसी सरकार को कार्यकाल पूरा नहीं करने दिया गया। वाजपेयी को छोडक़र कोई भी गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया। कार्यकाल को छोड़ो पूरे ३६५ दिन भी गद्दी पर नहीं बैठ पाया। कांग्रेस का समर्थन चरणसिंह को १७० दिन,चंद्रशेखर को २२३  देवेगौड़ा को ३२४ और गुजराल को ३३२ दिन रहा। गैर भाजपा सरकारों में कांग्रेस ने मोरारजी देसाई की सरकार को २ साल १२६ दिन, वीपी सिंह को ३४३ दिन और पहली बार की वाजपेयी सरकार को १६ दिनों में गिरा दिया। कांग्रेस ने गैर कांग्रेसी सरकारों में कोई न कोई चरणसिंह, चंद्रशेखर या देवेगौड़ा हमेशा की खाजे रखा ताकि समय आने पर काम आ सके।
अब कांग्रेस ने समर्थन के नाम पर अरविंद केजरीवाल को टोपी पहनाई है। पुराने डेटा के आधार पर केजरीवाल मान सकते हैं कि उन्हें कम से कम ३४३ दिन का समर्थन तो मिल ही सकता है। इस समर्थन की कीमत वह लोकसभा चुनाव में फिर किसी को चरणसिंह या चंद्रशेखर बनवाने की शर्त पर ले सकती है। यानी २०१४ के बाद एक और मध्यावधि चुनाव की तैयारी। अब ऐसा होता है या नहीं यह तो देश की जनता ही तय करेगी।

भारतीय समाज और आजादी के आंदोलन में टोपी

भारतीय समाज के साथ राजनीति में भी टोपी, पगड़ी और सांफे का प्रमुख स्थान रहा है। आजादी के आंदोलन में सारे आंदोलनकारी टोपी, पगड़ी  या सांफा पहनते थे। सिर्फ भगतसिंह हैट लगाते थे। कांग्रेस की तो पहचान थी यह टोपी। यहां तक कि कांग्रेस के क्रांतिकारी नेता सुभाषचन्द्र बोस तक टोपी लगाते थे। यहां तक कि आजादी के आंदोलन से जुड़े सबसे आधुनिक नेता पं. जवाहरलाल नेहरू भी टोपी लगाते और अपने नाम के आगे पं. लगाते।  तिलक की पगड़ी, मौलाना कलाम की टोपी सभी को याद होगी।

नेहरू से वीपी सिंह तक टोपी का जलवा



लालकिले से (भाग-5) इंतजार कीजिए इन चार और घोटालों का, सबसे बड़ा यमुना एक्सप्रेस वे घोटाला


लालकिले से (भाग-5)

इंतजार कीजिए इन चार और घोटालों का, सबसे

बड़ा यमुना एक्सप्रेस वे घोटाला


लोकसभा चुनाव से पहले चार बड़े घोटाले सामने आ सक ते हैं। इससे यूपीए और कांग्रेस की मुश्किलें और भी बढ़ सकती है। वैसे भी पिछले तीन दिनों में जयंती टैक्स, आपरेशन ब्लू स्टार में ब्रिटेन की मदद लेने और दाउद के आदमी को बचाने जैसे आरोप आरोप कांग्रेस पर लग चुके हैं। आने वाले दिनों में ये चार मुद्दे चर्चा में रहेंगे।
1. यमुना एक्सप्रेस वे घोटाला - सीएजी अपनी अगली रिपोर्ट में भी एक नए घोटाले से परदा उठाने जा रही है। इस बार का घोटाला यमुना एक्सप्रेस का है। इसमें जमीन, मुआवजे और खास लोगों को फायदा पहुंचाने का खेल सामने आये हैं। सीएजी की रिपोर्ट अभी आई नहीं है पर सूत्रों का कहना है अधिग्रहित जमीन जिस कीमत पर निजी बिल्डरों को बेची गई उसमे अनियमितताएं की गईं हैं। रेट का क्या मामला है और यह घोटाला कितने का है यह तो फरवरी में पता चलेगा जब रिपोर्ट संसद के पटल पर रखी जाएगी। पर इससे इसमें सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह और बसपा सुप्रीमो मायावती निशाने पर हैं। चंूकि ये यूपीए को समर्थन दे रहे हैं इसलिए यूपीए की भी मुश्किलें बढ़ेंगी। मुलायम और माया दोनों ने यमुना एक्सप्रेस वे पर जेपी ग्रुप को जमीनें आवंटित की थीं। वैसे इस रिपोर्ट का कुछ हिस्सा लीक हो चका है। 165 किलोमीटर का 6 लेन यमुना एक्सप्रेस वे आगरा को ग्रेटर नोएडा से जोड़ता है और इस पर करीब 13 हजार करोड़ रूपए की लागत आई है। इस एक्सप्रेस वे दोनों ओर बिल्डरों को विभिन्न प्रयोजनों के लिए जमीनें आवंटित की गईं। इनमें जेपी ग्रुप प्रमुख है। सीएजी के इस बात का आडिट कर रही है कि किसानों से ली गई जमीन बिल्डरों को किस रेट पर दी गई और इसके कैसे अनियमिता हुई है।
2. राबर्ट वाड्रा के जमीन घोटाले (शर्ते लागू ) - सोनिया गंाधी के दामाद और राहुल गांधी के आदरणीय जीजाश्री और प्रियंका गांधी के पतिदेव श्री वाड्रा ने राजस्थान में कई स्थानों पर जमीन घोटाले किए हैं। इसकी फाइल मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे के पास पहुंच गई है। ये घोटाला कुछ-कुछ तो लोगों को पता है पर यह असल तौर पर कितना बड़ा है यह या तो खुद वाड्र जानते है या भाजपा वाले या फिर केजरीवाल। भाजपा ने इसे मोदी के कथित जासूसी कांड में बचाव के तौर पर संभाल रखा है। अगर जासूसी कांड के लिए केन्द्र सरकार की ओर से घोषित आयोग अमल में लाया जाता है तो भाजपा भी इस जमीन घोटाले को सामने लाकर उसकी जांच के लिए राजस्थान में आयोग का गठन कर सकती है। पिछले दिनों भाजपा के राजस्थान के पांच सांसदों ने बाकायदा दामाजी के जमीन घोटाले से महारानी को अवगत करवाया और जांच की मांग की। गलियारे में कुछ लोगों का यह भी मानना है कि महारानी इस कांड की जांच न करवाएं इसलिए जासूसी मामले में केन्द्र ने मोदी पर आयोग का शिकंजा कसा है। यानी तुम वाड्रा के मामले में चुप रहो और हम मोदी के मामले में।
3. क्रिकेट फिक्ंिसग और सट्टेबाजी - पूर्व गृह सचिव आरके सिंह ने क्रिकेट फिक्ंिसग और सट्टेबाजी कांड में दाउद से जुड़े एक व्यापारी को बचाने का आरोप लगाया है। दिल्ली के गलियारों में चर्चा तो यह भी इस मामले में यूपीए के एक मंत्री को भी बचाया गया है। आईबी और रा की फोन टैपिंग में उसके नाम का अंदाजा सभी को हो गया था। नाम आता इससे पहले फोन कट गया। चर्चा यह भी है कि
4. पीएमटी महाघोटाला : मध्यप्रदेश पीएमटी महाघोटाले की आग अब राजभवन तक पहुच गई है। पता चला है राजभवन के करीबी और पीएमटी घोटाले के एक मास्टर मांइड के बीच शतक से भी अधिक बार बात हुई है। एसटीएफ के पास इसका रिकार्ड मौजूद है। इस बीच पता चला है कि पीएमटी परीक्षाओं में मुन्नाभाई गैंग की शुरूआत केन्द्रीय परीक्षाओं से ही हुई। इसके बाद ये राज्यों में फैला।

लाल किले से (भाग-४) केजरी भाई जरा बताएंगे, कविराज किसकी फाच्र्यूनर में और कितने बड़े काफिले के साथ गए थे अमेठी


राहुल गांधी को घेरने के लिए सोमवार को जब कविराज अमेठी गए तो तीस लाख की फाच्र्यूनर   कार में थे। उनके आगे-पीछे तीस-चालीस कारों का काफिला था।


लाल किले से (भाग-४)

केजरी भाई जरा बताएंगे, कविराज किसकी फाच्र्यूनर में और कितने बड़े काफिले के साथ गए थे अमेठी


केजरीवाल सोमवार को जनता दरबार के मामले में एक्सपोज हुए तो उनके कविराज चेले अमेठी में। यानी आज बहुत दिन बाद केजरी एंड कंपनी बैकफुट पर दिखी। बहुत शोर सुनते थे बाजू में दिल का पर चीरा तो कतरा ए खून न निकला की तर्ज पर तामझाम वाले मामले में कविराजअमेठी में धरे गए। दोनों गुरू-चेले खूब भाषण झाड़ते थे कि हम तो वीआईपी कल्चर, तामझाम और गाडिय़ों के काफिले के विरोधी हैं। राहुल गांधी को घेरने के लिए सोमवार को जब कविराज अमेठी गए तो तीस लाख की फाच्र्यूनर कार में थे। उनके आगे-पीछे तीस-चालीस कारों का काफिला था। गुरू ज्ञान देते हैं कि वो तो सिर्फ वैगन आर में चलना चाहते हैं। ना ना करते आप के सभी मंत्रियों ने इनोवा ले ही ली तो प्लेन के बिजनेस क्लास में चलने वाले कविराज के लिए फिर कारों की क्या कमी। मेरा केजरी भाई से सवाल है कि यह कार किसकी है और काफिले में कितनी कारें थी। यह सवाल इसलिए पूछ रहा हूं क्योंकि ये मानक आपने दूसरे राजनीतिक दलों से लिए निर्धारित किए हैं। इसलिए यह नियम आप पर भी लागू होता है।
आज इलेक्ट्रानिक मीडिया लंबे समय बाद संतुलित नजर आया। गोवा से मोदी ने केजरीवाल का नाम लिए बिना मीडिया पर निशाना साधा था कि जनता को टेलीविजन वाला नेता चाहिए या धरती पर विजन वाला मामला। जैसे ही केजरीवाल ने सोमवार को घोषणा की कि वे जनता दरबार नहीं लगाएंगे चैनलोंपर उन पर सवाल उठने शुरू हो गए। इसी बीच मोदी के जनता दरबार की सफलता की कहानी और उसके फार्मेट भी चले। रही सही कसर पटना में नीतिश के दरबार में हुए हंगाने ने पूरी कर दी। इस बीच खबर आई कि हवा से चलने वाले पानी के मीटर जल बोर्ड फिर से लगा रहा है। केजरी ने मीडिया के सामने कहा कि उन्हें इस बारे में कुछ भी पता नहीं है। इस पर फिर सवाल उठने लगे हैं। आज कांग्रेस के प्रवक्ता चैनलों पर यह कहते हुए नजर आए कि बिजली के दामों में पचास प्रतिशत कमी नहीं हुई है। यानी केजरी झूठ बोल रहे हैं। इस पचास प्रतिशत कमी में शीला सरकार की दी हुई 25 से 30 फीसदी सब्सिडी भी शामिल है।
इस सब हंगामें के बीच केजरी का सबसे बेहतरीन फैसला दब गया। वह था रिटेल में एफडीआई को अनुमति देने के शीला सरकार के फैसले को पलतने का। इससे दिल्ली के लगभग 75 हजार किराना दुकानों को फायदा होगा। लेकिन नौटंकी के चलते ये तो होना ही था।
कविराज ने आज अमेठी में राहुल गांधी के लिए कुछ अच्छे जुमले सुनाए। आप भी गौर फरमाएं।
१. दुनिया के सबसे बड़े और ताकतवर देश अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा का डाक्टर भारतीय है। वे उसी से इलाज करवाते हैं। जबकि हमारी आदरणीय माताजी सोनिया गांधीजी इलाज के लिए विदेश जाती हैं। जब वे देश के बेटों पर भरोसा नहीं करती तो हम उनके बेटे पर क्यों भरोसा क्यों करें।
२. जब विदेश से लौटकर प्रधानमंत्री यह कहते हैं कि वे राहुल के लिए प्रधानमंत्री का पद छोड़ सकते हैं तो यह उन हजारों भारतीय बेटों का अपमान है जो अपने सामथ्र्य के बल पर आगे बढ़े हैं।
३. देश पेन में होता है और शहजादा स्पेन में होता
हैं।

लाल किले से (भाग-3) जनता दरबार की इन तीन कहानियों से खुद तय करें करें कि कौन श्रेष्ठ है केजरीवाल, नीतिश कुमार या नरेन्द्र मोदी

लाल किले से (भाग-3)
जनता दरबार की इन तीन कहानियों से खुद तय करें करें कि कौन श्रेष्ठ है केजरीवाल, नीतिश कुमार या नरेन्द्र मोदी

चावल पकाते समय सिर्फ एक चावल को हाथ में लेते ही पता चल जाता है कि वह पका है या नहीं। सारे चावल नहीं देखने पड़ते। इसी तरह जनता दरबार के माडल की एक कहानी से आप खुद तय कर लें कि केजरी, नीतिश और मोदी में कौन बेहतर है।

इन दिनों तीन राज्यों के माडल चर्चा में हैं। पहला गुजरात, दूसरा बिहार और तीसरी दिल्ली। अब इनमें से कौन सा बेहतर है यह राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और मीडिया के पंडितों के लिए बहस का विषय हो सकता है। लेकिन पिछले तीन दिनों से दिल्ली में जनता दरबार की एक असफलता के उदाहरण ने दो माडलों की पोल खोलकर रख दी। दूसरा उदाहरण सोमवार को पटना में अनायास ही सामने आ गया। इस घटनाक्रम से जब गुजरात के तीसरे माडल की तुलना हुई तो वह मीलों आगे साबित हुआ। मसलन नरेन्द्र मोदी ने आज साबित कर दिया कि प्रशासनिक व्यवस्था को कैसे बेहतर प्रबंधन के साथ चलाया जाता है। इससे देश के दो बड़े राज्यों बिहार और दिल्ली के सत्ताधीशों के जनता दरबार पर सवालिया निशान लगे और मोदी के जनता दरबार की जय होती रही। श्रृंखला लाल किले से के पहले भाग में हमने चर्चा की थी कि केजरीवाल ने कहां से क्या कापी, पेस्ट किया। इसमें जनता दरबार का भी जिक्र था पर आयडिये के कापी पेस्ट में सावधानी नहीं रखी और दुर्घटना हो गई।
पहला वाकिया केजरी की दिल्ली का है। दिल्ली की जनता को उम्मीद थी कि केजरी के जनता दरवार में उनके दु:खड़ों और परेशानियों की सुनवाई होगी। पर पहले ही दिन के दरबार में हजारों की भीड़ और बेइंतजामी के बीच से केजरी ऐसे दुम दबाकर भागे कि जनता दरबार से तौबा कर ली। सोमवार को बाकायदा मीडिया से कहा कि वे अब वे जनता दरवार नहीं लगाएंगे। जनता अपनी शिकायतें आनलाइन, कालसेंटर और लिखित में दे सकती है। वे शनिवार को सिर्फ जनता से मिलेंगे पर उनकी शिकायतें नहीं लेंगे। मिलने के लिए भी वे खुद ही इलाके तय करेंगे। केजरीवाल जी जनता को पहले भी आनलाइन और लिखित में शिकायतें देती रही है पर उनकी सुनवाई हो जब ना। सिर्फ खबरों में बने रहने के लिए जनता दरबार को कांग्रेस के इशारे पर अधिकारियों से ऐसा फेल करवाया कि केजरीवाल को छत पर चढऩे के अलावा और कोई दूसरा विकल्प नहीं सूझा।
दूसरा वाकिये में सोमवार को पटना में मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के जनता दरवार में बेरोजगारों ने हंगामा किया। इनका दर्द यह था कि चयनित होने के बाद भी उन्हें सरकारी नौकरी नहीं दी जा रही है। इनकी शिकायत थी कि मुख्यमंत्री दरबार में सुनवाई नहीं हो रही है जब सुनवाई ही नहीं होती तो इसे बंद कर देना चाहिए। नीतिश का सिस्टम भी गुजरात को कापी कर बनाया गया था। इन दोनों वाकियों से पता चलता है कि सत्ता मेंआने के बाद लोग जनता को कैसे हल्के में लेते हैं।
जनता की तकलीफ को सुनते हुए उनसे मिलो, उसका समाधान करो और जनता से आप अपने हिसाब से मिलो इसमें फर्क है। पहले माडल में आप जनता से दुख- दर्द से वाकिफ होते हैं। और दूसरे में आप अपनी सुविधा से मिलते हैं अगर आप उनकी शिकायतें नहीं लेंगे तो जनता से मिलना सिर्फ एक रस्म अदायगी मात्र है। छत्तीगढ़ में रमनसिंह के जनदर्शन में आने वाले लोगों में बड़ी संख्या में वे गरीब होते हैं जिन्हें इलाज के लिए सरकार से मदद की दरकार होती है। रमनसिंह पहली प्राथमिकता से उन्हें मदद देते भी हैं।
तीसरे वाकिये में शनिवार को केजरीवार के जनता दरबार कार्यक्र्रम की असफलता के बाद मोदी के जनता दरबार स्वागत का माडल चर्चा में था। इसमें मोदी महीने में एक बार खुद शिकायतों को देखते हैं और उनके निराकरण के बारे में खुद वीडियों कान्फ्रेन्सिंग से कलेक्टर, एसपी और अन्य अधिकारियों से बात करते हैं। मुख्यमंत्री सचिवालय के कर्मचारी संबंधित शिकायत का समाधान होने तक फालोअप करते हैं। इसके अलावा स्वागत दरबार चार स्तरीय है। पहला राज्य स्तरीय। इसमें मुख्यमंत्री और मंत्री समस्याएं सुनते हैं। दूसरा जिला स्तरीय है इसमें कलेक्टर, तीसरा तहसील स्तरीय है इसमें तहसीलदार और चौथा ग्राम स्तरीय है इसमें सरपंच समस्याओं का निकाकरण करते हैं। सभी को पता है कि खुद मुख्यमंत्री माह के तीसरे गुरूवार को बैठते हैं और पूरे सिस्टम की समीक्षा करते हैं इसलिए कोई भी कोताई नहीं बरतता।
इसी श्रृंखला के भाग-1 में बताया था कि मोदी के सिस्टम को बिहार ने भी कापी किया है। केजरीवाल ने भी आनन-फानन में कापी किया लेकिन बिना किसी तैयारी के। कहीं से कोई अच्छे आयडिया को ग्रहण करने में हर्ज नहीं है पर आयडिया की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि आपने उस आयडिये को कितना समझा है और उसे कितना लागू किया है।



निष्कर्ष- इन तीनों उदाहरणों के अध्ययन से पता चलता है कि योजनाएं या कानून सभी जगह होते हैं उनकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उन्हें कितनी शिद्दत से लागू किया गया है। जैसे चुनाव आयोग पहले भी था पर बेअसर लेकिन टीएन शेषन ने उन्हीं अधिकारों का इस्तेमाल कर अच्छे- अच्छे नेताओं और राजनतिक दलों को नाकों चने चबवा दिए और साबित किया कि चुनाव आयोग बहुत ताकतवर है। यानी सारा खेल प्रबल इच्छाशक्ति का है। यही है मोदी की सफलता का राज।

सोमवार, 13 जनवरी 2014

लालकिले से (भाग-२) मुस्लिम वोटों के लिए मजमा लगाने लगे मदारी

लालकिले से  (भाग-२)

मुस्लिम वोटों के लिए मजमा लगाने लगे मदारी

संविधान ने नाम पर खाई  हर कसम और प्रावधान को तोड़ रहे  देश के गृहमंत्री  सुशील शिदें और उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बर्खास्तगी के लिए पर्याप्त संवैधानिक आधार हैं।
केस-1: मुजफ्फरनगर दंगों में जब सिर्फ मुस्लिम लोगों के मुआवजा देने की बात अखिलेश यादव सरकार ने की  तो सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को कड़ी फटकार लगाई थी कि राज्य धर्म के आधार मुआवजा नहीं दे सकता। इसलिए यूपी सरकार को सभी पीडि़तों को मजबूरी में मुआवजा देना पड़ा।
केस-२: केन्द्रीय केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील शिंदे ने राज्यों से फिर कहा है कि किसी की गिर$फतारी से पहले यह जांच लें कि इसमें कोई मुस्लिम तो नहीं है।
शहर में तनाव है क्या, पता करो चुनाव है क्या की तर्ज पर लोकसभा चुनाव सामने आते ही मुस्लिम वोटों के लिए राजनीति के बाजीगर मजमा लगाने,सजाने हैं। क्या आपको पता है कि धर्म के नाम पर वोटों की राजनीति करना संविधान की प्रस्तावना, एवं  पद और गोपनीयता की शपथ के खिलाफ और जनप्रतिनिधत्व कानून के खिलाफ है। आज इस मुद्दे को इसलिए रख रहा हूं कि मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए आज संविधान और शपथ का द्रोपदी की तरह चीरहरण किया जा रहा है। भारत में कार्यपालिका, व्यवस्थापिका और न्यायपालिका सर्वोच्य नहीं है। अगर कोई सर्वोच्य है तो वह है संविधान यानी कानून का शासन।  आज जब देश के प्रमुख लोग ही संविधान को तोड़ रहे हैं। ऐसे में उन्हें पद पर रहने का एक मिनट भी अधिकार नहीं है। यह वह मुद्दा है जिस पर सरकार या मंत्री को बर्खास्त किया जा सकता है। नेता तो पहल करेंगे नहंी अब सुप्रीम कोर्ट पहल कर ऐसे लोगों को बर्खास्त घोषित करे। कारण कि सुुप्रीम कोर्ट के पास संविधान की रक्षा और उसका पालन सुनिश्चित कराने की शक्ति है। लोकसभा चुनाव से पहले किस- किस नेता ने मुस्लिम वोटों के लिए संविधान और शपथ तो तोड़ा उनका एक पोस्टमार्टम मेरी श्रृंखला लालकिले से के भाग-२ में प्रस्तुत है।

केन्द्र सरकार ने मुस्लिम वोटों के लिए यह किया

१.    केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील शिंदे ने पहले विधानसभा चुनाव के बाद अब लोकसभा चुनाव से पहले राज्यों को कहा है कि वे आतंकवाद के मामले में जेल में बंद मुस्लिम लोगों के मामलों की समीक्षा करें।
२.    सुशील शिंदे ने फिर राज्यों से कहा है कि किसी की गिर$फतारी से पहले यह जांच लें कि इसमें कोई मुस्लिम तो नहीं है।

यहां किया संविधान और शपथ का उल्लंधन

संविधान का उल्लंधन- संविधान की प्रस्तावना में लिखा है कि वह पंथनिरपेक्ष है यानी विभिन्न समुदायों से पंथ के आधार पर भेद-भाव नहीं करेगा। कानूनन किसी भी बेगुनाह को जेल में बंद नहीं किया जाना चाहिए। फिर वह चाहे हिन्दू हो या मुस्लिम। आतंकवाद जैसे गंभीर मसले पर संविधान खुद गृहमंत्री को कानून हाथ में लेने की अनुमति नहीं देता। वे गुनाहगार हैं या नहीं इसका फैसला तो अदालत करेगी। हां अगर वे सचमुच कुछ करना चाहते हैं तो न्याय प्रक्रिया की गति को तेज करवा सकते हैं। जो उन्हें करवानी भी चाहिए लेकिने वे इसे छोडक़र सब कर रहे हैं।
शपथ का उल्लंधन- शिदें ने यह कहकर अपनी उस शपथ तो तोड़ा है जो उन्होंने संघ के मंत्री बनने के समय ली थी। संविधान की अुनसूची ३ और पैरा ५ के अनुसार उन्होंने जो शपथ ली थी उसमें ये बातें भी थी वे - विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा रखूंगा।  मैँ सभी लोगों के साथ भय या पक्षपात, राग या द्वेश के  बिना संविधान और विधि के अनुसार न्याय करूंगा। शिंदेजी आप तो संविधान  की भावना के अनुसार एक धर्म विशेष के प्रति चुनावी राग दिखा रहे हैं। पर शिदेंजी क्या दोष वे तो वहीं करते हैं जो आलाकमान कहता है। इसमें संविधान टूटता है तो टूट जाए।

उत्तरप्रदेश में तो अखिलेश ने हद ही कर दी

  1.  यूपी की अखिलेश सरकार ने घोषणा की थी कि मुजफ्फरनगर दंगों के मुस्लिम पीडि़तो को मुआवजा दिया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट की इस फटकार के बाद कि राज्य किसी को भी धर्म के आधार पर मुआवजा नहीं दे सकता सरकार को सभी पीडि़तों को मुआवजा देने का फैसला करना पड़ा।
  2.  मुजफ्फरनगर दंगों के मुस्लिम आरोपियों को छोडऩे पर यूपी सरकार विचार कर रही है।
  3.  मुजफ्फरनगर दंगों के पांच हजार से भी कम शरणार्थी शिविरों में सोनिया, राहुल, मनमोहन, लालू सहित सभी नेता जा चुके हैं पर 3० साल से विस्थापिम पांच लाख कश्मीरी पंडितों के शिविरों में इनमें से एक भी नेता नहीं गया।

यहां किया संविधान और शपथ का उल्लंधन

  1. मुजफ्फरनगर दंगों में जब सिर्फ मुस्लिम लोगों को मुआवजा देने की बात आई तो सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को फटकार लगाई थी कि राज्य धर्म के आधार मुआवजा नहीं दे सकता। इसलिए यूपी सरकार को सभी पीडि़तों को मजबूरी में मुआवजा देना पड़ा। यह संविधान के सेक्यूलर ढांचे और उस शपथ के खिलाफ है जिसमें सभी के साथ न्याय करने की बात कही गई है।
  2. मुजफ्फरनगर दंगों के मुस्लिम आरोपियों को छोडऩे का विचार फिर संविधान और शपथ के खिलाफ जाता है।
  3. मुजफ्फरनगर दंगों के 5000 से भी कम शरणार्थियों से  राजनीतिक दल के नेताओं का विशेष राग और 5 लाख कश्मीरी पंडितों की उपेक्षा दर्शाती है कि संविधान की प्रस्तावना और शपथ के कथन के अनुसार स्टेट और उसके मंत्री लोगों से भेदभाव कर रहे हैं।

आम आदमी पार्टी

दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले साम्प्रदायिकता के आरोपों से घिरे मौलाना तौकीर रजा खान का समर्थन लेने के लिए आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल भी गए। तब तो केजरीवाल किसी पद पर नहीं थे और न ही उन्होंने संविधान के नाम की कमस खाई थी। अपने आप को नैतिकता का पुरोधा कहने वाले केजरीवाल एक नागरिक होने के नाते संविधान को कैसे तोड़ सकते हैं।
अंतंत :  सुशील शिंदे करें भी क्या करें अब संविधान को मानें या आलाकमान को। उनके हालात पर ये शेर ही काफी है।
ये बदन से नहीं जेहन से अपाहिज हैं, वही करेंगे जो रहनुमा बताएगा।


रविवार, 12 जनवरी 2014

लालकिले से (भाग-1) कापी, पेस्ट और पिपली लाइव से बन गया केजरीवाल का दिल्ली माडल


लालकिले से (भाग-1)

                           कापी, पेस्ट और पिपली लाइव से बन गया                                    केजरीवाल   का दिल्ली माडल       

  केजरीवाल ने बिजली कपंनी का आडिट, वार्डसभाएं, जनता दरबार, एंटीकरप्शन हैल्प लाइन, सस्ती बिजली के ५ फंडे, ३ भाजपाशासित राज्यों से कापी किए हैं।

  कांग्रेस के महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों के दावानल जैसे गुस्से को डाइवर्ट करने के लिए भ्रष्टाचार के खिलाफ केजरीवाल का हेल्पलाइन नंबर, जनता दरबार, बिजली के बिलों में कटौती को पिपली लाइव की तर्ज पर टीवी चैनल ऐसे दिखा रहे हैं जैसे कि यह देश में पहली और सिर्फ पहली बार हो रहा हो। पर ऐसा है नहीं केजरीवाल ने भाजपा शासित राज्यों में गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और गोवा से पांच चीजें कापी की और पेस्ट करके दिल्ली में लागू कर दीं। देखें कहां से क्या चुराया। चूंकि मैंने मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़, राजस्थान और गुजरात में पत्रकार के तौर पर पिछले १३ साल गुजारे हैं इसलिए ये मेरी निगाह में सबसे पहले आया। इसलिए आज से लोकसभा चुनाव तक राजनीति की हर छोटी- बड़ी बात का विश्लेषण पढ़े मेरी विशेष चुनाव श्रृंखला- लालकिले से.. आज प्रस्तुत है इसकी पहली कड़ी। जिसमें कापी, पेस्ट का पोस्टमार्टम किया गया है। वैसे अच्छी चीजें कहीं से भी ली जा सकती हैं इस पर कोई रोक नहीं है पर मेरी आपत्ति है पेस्ट करके इसे अपना बताने पर। देखें कहां से क्या कापी,पेस्ट किया।
  1. गुजरात से चुराया- जनता दरबार, एंटीकरपश्न हेल्पलाइन।
  2. मध्यप्रदेश से चुराया- बिजली कंपनियों का आडिट और वार्ड सभाओं का रसायन।
  3. छत्तीसगढ़ और गोवा से चुराया-सस्ती बिजली का फार्मूला और जनता दरबार।

गुजरात से यह-यह किया कापी

स्वागत: जनता से सीधे मुलाकात के कार्यक्रम को जनता दरबार के रूप में खासकर राज्यों के मुख्यमंत्री सालों से चला रहे हैं लेकिन इसे सही आकार दिया गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने। यह गांधीनगर सचिवालय में १३ साल से प्रति मंगलवार को चल रहा है। उसमें भी पिछले दस सालों यानी २००३ से यह स्वागत के नाम से व्यवस्थित और संगठित तौर पर चल रहा है।गांधीनगर जाने के लिए उस दिन बसें भी चलती है, १० रूपए में वहां खाना भी मिलता है। मोदी सहित सारे मंत्री अपने-अपने कक्षों में जनता की समस्याएं व्यवस्थित रूप से सुनते हैं। इस नाम से पोर्टल भी है जिसमें आप अपनी समस्याओं के स्थिति के बारे में जान सकते हैं। मोदी का मुख्यमंत्री सचिवालय गुणवत्ता की हिसाब से आईएसओ-९००१ प्रमाण पत्र प्राप्त है।
http://swagat.gujarat.gov.in/
हेल्पलाइन- गुजरात में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए पांच साल पहले हेल्पलाइन नंबर१८००२३३४४४४४ है। इसके लिए अलग से पूरा पुलिस महकमा तैनात है। इसके बाद गुजरात में भ्रष्टाचार के मामलों में कमी आई है।
ये ये हैं इस माडल के फालोअर -
छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी और पिछले १० साल से रमनसिंह प्रति गुरूवार को जनदर्शन में लोगों से मिलते हैं। गुजरात की तर्ज पर यहां पर जनदर्शन का पोर्टल है। उसमें जनता को उसकी शिकायतों के समाधान की स्थिति पता चलती है।
http://cg.nic.in/jandarshan/
बिहार के मुख्यमंत्री ने भी मोदी की ही तर्ज पर पोर्टल और हेल्पलाइन नंबर जारी किया है। वे मोदी की तर्ज पर लोगों से मिलते है। जेडीयू से अलग होने के बाद भाजपा नेता सुशील मोदी भी अपना दरबार लगाते हैं।
http://www.bpgrs.in/
BPGRS/Janta Darbar Helpline No. 0612-2201000.
फालोअर- करंट फालोअर हैं केजरीवाल

मध्यप्रदेश से यह-यह किया पेस्ट

बिजली कंपनियों का आडिट: बिजली कंपनियों का आडिट शिवराजसिंह ने आरंभ किया था। इसकी रिपोर्ट आ चुकी है। इसमें बताया गया है कि प्रदेश में कोयले से जितनी बिजली बननी चाहिए थी नहीं बन रही है। इस रिपार्ट पर अब राज्य सरकार को फैसला करना है।
वार्ड सभाएं: वार्ड सभाओं का फंडा मध्यप्रदेश और उसमें भी इंदौर से निकला है। तत्कालीन महापौर और वर्तमान यूडीएच मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने २००४ इंदौर में प्रयोग के तौर इसकी शुरूआत की थी। इसका मकसद था मोहल्ले के विकास में लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करना था। बाद में २००९ में इसे पूरे प्रदेश में लागू कर दिया गया। कुछ वार्डसभाएं बनीं भी थीं पर इस दौर यूडीएच मंत्री रहे बाबूलाल गौर की लापरवाही से वार्ड सभाएं नहीं बन पाईं। इस बार विजयवर्गीय फिर यूडीएच मंत्री बने हैं इसलिए वार्ड सभाओं पर वे फिर से काम आरंभ कर रहे हैं।
फालोअर- इस माडल के भी करंट फालोअर हैं केजरीवाल।

छत्तीसगढ़ और गोवा से लिया सस्ती बिजली का आयडिया

गोवा और छत्तीसगढ़ में १०० या २०० यूनिट के लिए बिजली के रेट लगभग पौने दो रूपए प्रति यूनिट हैं।
फालोअर- इसके भी करंट फालोअर हैं केजरीवाल। सब्सिडी देकर रेट कम किए। केजरीवाल ने घोषणा की कि उन्होंने ५० फीसदी रेट कम किए हैं पर इसमें शीला दीक्षित की सब्सिडी भी शामिल है। शीला दीक्षित के जुलाई में १०० यूनिट तक १.२० और २०० यूनिट तक १ रूपए प्रति यूनिट की सब्सिडी दी थी। इस हिसाब से केजरीवाल ने २० से २५ फीसदी फीसदी ही राहत दी है वो भी सभी को नहीं।
सबसे बेहतर आयडिया- जनता की शिकायतों पर सबसे किफायती और बेहतर सिस्टम मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव और भोपाल के पूर्व भाजपा सांसद सुशीलचंद्र वर्मा ने बनाया था। वे अपने यहां आने वाली शिकायतों को संबंधित विभागों और लोगों को अपने लेटर पर पत्र के साथ भेजते थे और इसकी सूचना पोस्टकार्ड से आम आदमी तक भेजते थे।
चलते चलते- राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी मध्यप्रदेश से तीर्थदर्शन योजना कापी की थी पर देखा हश्र क्या हुआ।

बुधवार, 2 अक्टूबर 2013

राहुल गांधी आपको देश का प्रधानमंत्री क्यों बना दें?


आपको कितना प्रशासनिक अनुभव है  ? 
आप किस राज्य के मुख्यमंत्री रहे हैं ?
 किस केन्द्रीय मंत्रालय में बतौर मंत्री काम किया है आपने ?

दागी जनप्रतिनिधियों वाले अध्यादेश और बिल को सिंह इज नाट किंग वाली मनमोहन सिंह केबिनेट ने वापस लेने का प्रस्ताव पारित कर राहुल और सोनिया गांधी का असली चेहरा सामने ला दिया है। दरअसल सोनिया और राहुल गांधी सत्ता तो चाहते हैं पर जिम्मेदारी और जवाबदेही से बचना ही नहीं भागना चाहते हैं। इससे यह साबित होता है कि दस साल पहले प्रधानमंत्री पद त्यागने का सोनिया का निर्णय ढकोसले के अलावा और कुछ था ही नहीं । अभी तक जनता- जनार्दन सुनती आई े थी कि वे सोनिया और राहुल गांधी परदे के पीछे से सरकार चलाते हैं पर यह सब कैसे होता है इसका सीधा प्रसारण राहुल गांधी ने दिल्ली के प्रेस क्लब से नानसेंस वाले बयान से कर दिया। चूंकि प्रधानमंत्री देश में नहीं थे इसलिए दोनों की कलई भी खुल गई। राहुल अगर देश चलाना चाहते हैं तो उनका स्वागत है पर देश परदे के पीछे से नहीं जिम्मेदारी और जबाबदेही से चलता है। पर आपको हम देश क्यों चलाने दें? क्या है आपका प्रशासनिक अनुभव? क्या आप कसी राज्य के 5 से दस साल तक मंत्री रहे हैं? क्या आपने केन्द्र सरकार के किसी महकमे में बतौर मंत्री काम किया है?
जैसे: कांग्रेस में पी चिदम्बरम बरसों तक वित्तमंत्री और गृह मंत्री रहे, पृथ्वीराज चौहान केन्द्र में मंत्री रहे और अब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री हैं, सलमान खुर्शीद सालों तक विदेश मंत्रालय संभाला है, कपिल सिब्बल दस साल से मंत्री हैं, कमलनाथ भी राजीव गांधी के जमाने से विभिन्न मंत्रालय संभाल चुके हैं। शीला दीक्षिते भी तीन पारी से दिल्ली की मुख्यमंत्री हैं। मंत्री बनने से पहले ये लोग संगठन में भी काम कर चुके हैं।
भाजपा के नरेन्द्र मोदी की मुख्यमंत्री के रूप में तीसरी पारी है। मध्यप्रदेश में शिवराजसिंह चौहान और छत्तीसगढ़ में रमनसिंह की दूसरी पारी का अंतिम दौर चल रहा है। तीसरा चुनाव उनके सिर पर है। सुषमा स्वराज कई सालों तक मंत्री रहने के बाद अभी लोकसभा में विपक्ष की नेता हैं। अरूण जेटली भी लंबे समय तक मंत्री रहे हैं। दिल्ली क्रिक्रेट कंट्रोल बोर्ड चलाते हैं। सुप्रीम कोर्ट के नामी वकील भी हैं। भाजपा के से सभी नेता संगठन के महत्वपूर्ण पदों पर रहे फिर उन्हें सत्ता में भागीदारी मिली।
यानी कांग्रेस और भाजपा में जो भी लोग अभी अग्रिम मोरचे पर हैं उन्होंने स्टेप बाय स्टेप पहले राजनीति और फिर प्रशासन चलाने की कला सीखी। राहुल अभी आप कांग्रेस के सिर्फ उपाध्यक्ष हैं। इतना ही काफी नहीं है प्रधानमंत्री बनने के लिए। राजीव गांधी की ताजपोशी की स्थिति और थी। इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद उन्हें कांग्रेस का नेता चुना गया। इसके अलावा पायलट के रूप में उन्हें लंबा अनुभव भी था। विमान का पायलट रोज हजारों जिंदगियों को जिम्मेदारी और जबाबदेही से लाता ले जाता है। अगर आप गांधी परिवार का ठप्पा हटाकर अगर विदेश में नौकरी तलाशें मेरा दावा है कि आपको पचास हजार रुपए की नौकरी पाने में पसीना आ जाएगा। विदेश में इसलिए भारत में आपको नौकरी देने की हिमाकत किसी के पास नहीं है।
अगर आप प्रधानमंत्री बनकर देश की सेवा का सपना देख रहे हैं तो यह आपका लोकतांत्रिक हक है। लेकिन मेरा अनुरोध इतना है कि किसी राज्य के मुख्यमंत्री या किसी विभाग के पांच साल मंत्री रहकर काम करें। इससे आपको प्रशासनिक अनुभव मिलेगा। आपकी दादी श्रीमती इंदिरा गांधी ने अपने पिता और देश के पहले प्रधानमंत्री पं जवाहरलाल नेहरू के कार्यालय में गैर सरकारी निजी सहायक के तौर पर काम किया। पं नेहरू के निधन के बाद वे राज्यसभा सदस्य मनोनीत हुईं। लालबहादुर शास्त्री के मंत्रिमंडल में वे सूचना और प्रसारण मंत्री रहीं। इसके बाद कहीं जाकर वे प्रधानमंत्री बनीं। जब देश गुलाम था तब कांग्रेस के नेताओं की मदद के लिए उन्होंने युवाओं की वानर सेना बनाई थी। यह काफी चर्चित थी।
अब परिवारवाद के दम पर तभी राजनीति चलेगी जब आप सक्षम होंगे। कारण कि राज्यों प्रशासनिक अनुभव वाले नेताओं की लंबी फौज तैयार हो चुकी है। यह अपने काम के दम पर ही खम ठोक रही है। इनमें गैर कांग्रेसी नेताओ का बोलबाला है। जैसे नरेन्द्र मोदी, शिवराज सिंह चौहान, रमनसिंह, नीतिश कुमार, नवीन पटनायक, ममता बनर्जी, उमर अबदुल्ला, जयललिता आदि। लिहाजा गांधी होने के ज्यादा जरूरी है योग्यता, जिम्मेदारी और जवाबदेही का होना। गांधी होने के आपको बोनस प्वांइट मिलेंगे और मिलना भी चाहिए। कारण कि भारत में तो माना जाता है कि बाप-दादाओं का जस तो आपको मिलता ही है।