मंगलवार, 21 जनवरी 2014

लालकिले से (भाग-14) तांगे में जुता बरात का एक घोड़ा और जनता की फजीहत


लालकिले से  (भाग-14)


तांगे में जुता बरात का एक घोड़ा और जनता की फजीहत



एक किस्सा है। एक तांगा हर तीस-चालीस कदम जाकर रूक जाता। रूकते ही तांगे वाला उतरता, डांस करता, फिर अपनी सीट पर बैठ जाता। तब कहीं जाकर तांगा आगे बढ़ता। फिर तीस-चालीस कदम बाद तांगा रूक जाता। फिर वही उतरने और नाचने की नौटंकी। जब तीन- चार बार ऐसा हो गया तो तांगे में बैठी सवारी से रहा नहीं गया। उसने तांगे वाले से पूछ ही लिया कि यह क्या लगा रखा है। तांगे वाले ने कहा- बाबूजी माफ करें, दरअसल आज मेरा घोड़ा बीमार है इसलिए मैंने इसमें बरात का घोड़ा जोत दिया है। कमबख्त को हर तीस-चालीस कदम पर डांस देखने की आदत है इसलिए डांस देखे बगैर आगे बढ़ता ही नहीं। मेरी भी मजबूरी है, ंइसे चलाने के लिए डांस करने की। अब क्या करूं।
दिल्ली के जनता के हाल भी इसी तांगे वाले जैसे हो गए हैं। बेचारे क्या करे। आंदोलन वाले घोड़े को सत्ता की बरात में जोत दिया। अब उसे को आंदोलन की आदत है। धरना-प्रदर्शन तो करेगा ही बे चारा।
१. दरअसल बिजली पानी के मुद्दों पर जोर-शोर से घोषणाएं करने के बाद जमीनी हकीकत शून्य है। बजट में प्रावधान किए बगैर इन्हें लागू नहीं किया जा सकेगा।
२. जनलोकपाल लाना मुश्किल है। कारण कि बाद में अन्ना को यह समझ में आ गया वे इस जिस जनलोकपाल की बात कर रहे थे उसका कद प्रधानमंत्री से भी बड़ा है और यह लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं है।
३. शीला दीक्षित के राष्ट्रमंडल खेल घोटाले समेत कांग्रेस के दर्जनों घोटालों पर अगर कार्रवाई करते हैं तो गृह मंत्रालय केजरीवाल और उनके एनजीओ के खिलाफ सीआईए समर्थित फोर्ड फाउंडेशन से फंडिग और आप को विदेशों से अनुमति लिए बगैर चंदा लेने के मामले में घेर सकता है।
४. कर्मचारियों को नियमित करने के लिए बजट कहां से आएगा। क्योंकि वो तो पानी-बिजली की सब्सिडी में चला जाएगा। दिल्ली सचिवालय के बाहर चल रहे शिक्षकों के धरने में जाकर उनकी बात सुनने की मुख्यमंत्री को फुरसत ही नहीं है।
५. दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं दिया जा सकता। कारण कि दिल्ली के राजधानी सिस्टम को वाशिंगटन डीसी की तर्ज पर बनाया गया है। संविधान के अनुच्छेद-239 के अनुसार दिल्ली की पुलिस केन्द्रीय गृह मंत्रालय के अधीन होगीञ्। भाजपा-कांग्रेस ने लोगों को अभी तक अंधरे में रखा कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने में परेशानियां हैं। केजरीवाल की धरना नौटंकी के बाद तो दिल्ली को यह दर्जा मिलने वाली संभावनाएं बिल्कुल समाप्त हो गईं हैं। कारण कि दिल्ली में केजरीवाल टाइप मुख्यमंत्री को पुलिस मिल जाए तो फिर तो प्रधानमंत्री पर भी मुख्यमंत्री कार्रवाई करवा सकता है। मोदी टाइप हो तो अमेरिकी दूतावास की खैर नहीं। दिल्ली के बाहरी इलाकों के लिए राज्य की पुलिस या दोहरी रिपोर्टिंग जैसी समन्वय वाली व्यवस्थाएं ही यहां लागू हो सकती हैं।
६. जब पुलिस ही नहीं है तो महिला सुरक्षा कहां से होगी। महिला कमान्डो टीम का गठन और उन्हें प्रशिक्षित करने में कम से कम दो साल चाहिए।
७. अवैध कालोनियों का नियमन और वहां पानी, सडक़, और सीवरेज की व्यवस्था करना खर्चीला और लंबे समय का काम है।
८. आम आदमी पार्टी के विधायक विनोद कुमार बिन्नी ने ही केजरीवाल और उनके चमचों की पोल खोल दी है। उनके साथ तीन-चार और विधायक बगावत करने के लिए तैयार हैं।  जिस कांग्रेस के खिलाफ जनता ने उन्हें जिताया उसी से उन्होंने घालमेल कर सरकार बना ली।
९. अरविंद केजरीवाल ने जितनी घोषणाएं की हैं उन्हें पूरा करने लिए एक लाख करोड रूपए चाहिए। इतना पैसा आएगा कहां से।
१०. राबर्ट वाड्रा, जिंदल और अंबानी पर आरोप लगाने का माद्दा नहीं बचा। पता नहीं इनके खिलाफ क्यों चुप बैठे हैं।
११. रही सही कसर केजरीवाल मंत्रिमंडल के दो मंत्रियों सोमनाथ भारतीय, राखी बिड़लान पर लगे आरोपों ने पूरी कर दी। राखी तो ठीक सोमनाथ भारतीय पर विदेशी महिलाओ के मोलेस्टशन और एक न्यायिक मामले में सबूतों से छेड़छाड के गंभीर आरोप हैं।                                      
अब आम आदमी पार्टी की नजर लोकसभा चुनाव पर है। महीने भर बाद आचार संहिता  लग जाएगी। काम कुछ दिख नहीं रहे हैं। जनता दरबार में वे लोगों के अपेक्षा और आक्रोश दोनों ही देख चुके हैं।
 ऐसे में जनता उनके खिलाफ धरना दे वे पुलिस को मुद्दा बनाकर महाराष्ट्र पुलिस के एक पुराने हवलदार के खिलाफ धरने पर बैठ गए। कारण कि बरात की घोड़ी को तांगे में जुतने पर चलने के लिए डांस का सहारा लेना पड़ता है सो धरना चालू है इसे था पढें।











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