बुधवार, 22 जनवरी 2014

लालकिले से (भाग-15) डेमोक्रेसी में ये कैसी ड्रामाक्रेसी?


लालकिले से  (भाग-15)

डेमोक्रेसी में ये कैसी ड्रामाक्रेसी?


 हमारी डेमाक्रेसी में इन दिनों ड्रामाक्रेसी का दौर चल रहा है। नाटकों के बीच नौटंकी, राजनीतिक प्रहसनों की नाटकीयता और अति नाटकीयता की होड़ सी लगी है। नरेन्द्र मोदी चाय वाले को समाज में पीछे से आगे लाने का ओबीसी सोश्यल ड्रामा देश को दिखा रहे हैं। राहुल गांधी मोदी की शैली में भाषण देेना चाह रहे हैं। पर देश को विजन देने के बजाय तीन सिलेंडर थमा देते हैं। दिल्ली कांग्रेस केजरीवाल से सीखते हुए समर्थन वापसी के लिए केजरीवाल की ही तर्ज पर रेपरेंडम करने का फैसला कर चुकी है। भाजपा काली टोपी के साथ भगवा टोपी की ओर जा रही है। केजरीवाल लगातार इतने बयान बदल  रहे हैं कि शब्द यू टर्न बार-बार घूम-घूम कर जलेबी बन गया है। दीवाना खुद के बयानों की मार तले पागल हो रहा है। महाराष्ट्र का एक हवलदार सारी दिल्ली को पुलिस की आड़ में ऐड़ा बना रहा है। बाबू ये नाटकों का दौर है। सब अपनी-अपनी स्क्रिप्ट के किरदार हैं। 

गणतंत्र को गरियाने का नाटक नहीं चलेगा

नाटक की शुरूआत आम आदमी पार्टी ने की। जिस कांग्रेस को पानी पी-पीकर कोसा उसी से समर्थन लेने के लिए रेफरेंडम का नाटक। सरकार बन गई और कुछ नहीं कर पाए तो उसे छुपाने और लोकसभा चुनाव के लिए धरने का नया नाटक। पर इस नाटक में गणतंत्र को गरियाने की अतिनाटकीयता कर बैठे मफलररामजी।  तभी तो पीछे हटना पड़ा। जिस लोकतंत्र की बलिहारी से आप वाले दिल्ली के तख्त पर आए तो उसे ही झुठलाने का अहम। गणतंत्र को गाली देने का दुस्साहस। झाडूवालों को  दिल्ली का जो तख्तो-ताज कुछ महीनों के संघर्ष मात्र से मिल गया इतिहास गवाह है कि उसे पाने के लिए हेमू से लेकर बहादुरशाह जफर और फिर अंग्रजों को कितनों का खून बहाना पड़ा। यही इंद्रप्रस्थ महाभारत के युद्ध का कारण बना। पहले मुगलों और फिर अंग्रेजों से  देश को आजाद कराने के लिए लाखों ने कुर्बानी दी। जब आजाद हुए तो आजादी को संविधान लिखकर अनुशासन में बांध दिया गया। ताकि कोई सिरफिरा इसपर सवाल न उठा सके। इसलिए हम दुनिया का सबसे बड़ा गणतंत्र हैं। हर चीज नियम कायदों में। और उस गणतंत्र को केजरीवालजी आप गरियाते हैं। इसी गणतंत्र की भावना से केजरीवालजी आपकी दिल्ली में सरकार बनी और देश ने 32 घंटे तक बंधक बनाने के आपके नाटक को झेला। वरना कोई और कोई तंत्र होता को गोलियां चल गईं होती, सैकडों लाशें बिछ गई होती और आप जेल में बंद होते। इसलिए यह कैसा गणतंत्र दिवस वाले बयान के लिए आप देश से माफी मांगे वो भी बिना नाटक किए।

समर्थन वापसी के लिए कांग्रेस करेगी रेफरेंडम 

अब कांग्रेस भी दिल्ली की जनता से रेफरेंडम या जनमत संग्रह कर पूछेगी कि क्या केजरीवाल की सरकार को समर्थन जारी रखना चाहिए या नहीं। जब कांग्रेस वाले रेफरेंडम करेंगे तो जवाब भी उन्हीं के अनुसार ही आएगा। केजरीवाल नें कांग्रेस से समर्थन लेने के लिए रेफरेंडम करवाया तो अब कांग्रेस समर्थन वापसी के मुद्दे पर रेफरेंडम करवाएगी। 26 जनवरी के बाद रेफरेंडम होगा। कांग्रेस का राजनीति करने में कोई सानी नहीं है- यानी केजरीवाल को केजरीवाल की शैली में नाटकीय जवाब। यानी कि समर्थन वापसी की पटकथा लिखनी शुरू हो चुकी है।

यहां घोषणाओं का नाटक और वहां हकीकत

केजरीवाल ने कभी नहीं सोचा था कि सरकार बनाने का उन्हें सममुच में नाटक करना पड़ेेगा। इसलिए असंभव से वादे कर दिए। बिजली- पानी की छूट अभी घोषणाओं में ही है। अमल बजट में आने के बाद ही होगा। हाई मोरल वादे ईमानदारी, सुरक्षा और बड़े बंगले  वाले वादों में तो अब वे लोकसभा चुनाव तक फंस ही गए हैं। सुरक्षा नहीं लेने की ऐसी नौटंकी कि दिल्ली पुलिस का  लगभग 50 सुरक्षाकर्मियों का स्टाफ उनके पीछे लगा रहता है। कारण कि सुरक्षा नहीं ली है। अगर ले लें तो दस में भी काम हो सकता है। पर मुई इस नौटंकी का क्या करें। जनता दरबार से सभी ने टोपीवालों को भागते देखा। आपही के कभी खासमखास रहे विनोद बिन्नी की आउटस्विंग आपसे खेलते ही नहीं बन रही है। कारण कि उन्होंने आपका सच सामने ला दिया। अब जनता धरने पे धरने दे इससे पहले धरने की नौटंकी क्या बुरी है। 

विरोधाभास का यह कैसा नाटक

अरिवंद केजरीवाल धरने पर बैठे और तीन पुलिस वालों के मुद्दे को इससे जोड़ दिया कि दिल्ली पुलिस राज्य के नियंत्रण में हो। केजरीवालजी यह कैसा विरोधाभास है कि जब जनलोकपाल की बात आती हैं तो आप सीबीआई तो लोकपाल के तहत लाने की बात करते हो और जब खुद आपके राज्य की बात आती है तो आप पुलिस को अपने नियंत्रण में लाने की बात करते हो। यह विरोधाभास का कैसा नाटक है।
दीवानों और  पागलों की नाटकीयता
उधर कविराज बयानों की नाटकीयता में उलझे इुए हैं। केरल की सेवाभावी नर्सों पर की गई टिप्पणी पीछे पड़ गई उपर से यह कहकर कि फिल्म इंसाफ का तराजू में किए बलात्कार के लिए क्या कांग्रेस राजबब्बर से माफी मांगने को कहेगी अपनी अति नाटकीयता का परिचय दिया। अरे भई फिल्म कैसी होगी इसे सेंसर बोर्ड पास करता है। इसलिए तो फिल्म को ए प्रमाण- पत्र मिला। आप तो कवि सम्मेलनों में बेरोकटाटे बोलते हैं। कभी संत निशाने पर होते हैं तो कभी सेवाभावी नर्सें। खुद सेंस नहीं रखोगे तो नानसेंस, न्यूसेंस सभी होगा। उस पर महाराष्ट्र वाले हवलदार साहेब बिना नाम लिए केजरीवाल को ऐड़ा मुख्यमंत्री कहने का सुपरफ्लाप डायलाग बकते हैं। हवलदार जी फिल्म पड़ोसन में किशोकुमार के  गीत में शब्द हैं- ओ ऐड़े सीधे हो जा रे। बाकी आप खुद समझदार हैं।

नाटक के बजाय मल्टीस्टारर फिल्म

6 साल पहले जब पत्रकार प्रशांत दयाल तो गुजरात विधानसभा चुनाव के समय स्टोरी छापी थी कि मोदी बचपन में चाय बेचा करते थे। उस समय मोदी समर्थकों को यह स्टोरी अच्छी नहीं लगी थी पर आज इस स्टोरी पर ड्रामे से भी आगे आरएसएस प्रोडक्शन की मल्टीस्टारर फिल्म मिशन 272 प्लस बन रही है। निदेशक हैं राजनाथ। वैसे इसे एकपात्रीय फिल्म कहें तो ज्यादा अच्छा रहेगा।






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