सोमवार, 20 जनवरी 2014

लाल किले से (भाग-११) केजरीवालजी, दिल्ली के मुख्यमंत्री की औकात ऐसे भी किसी बड़े शहर के महापौर से ज्यादा नहीं है, केन्द्रीय गृहमंत्री ही होते हैं दिल्ली के असली मुख्यमंत्री


लाल किले से (भाग-११)

केजरीवालजी, दिल्ली के मुख्यमंत्री की औकात ऐसे भी किसी बड़े शहर के महापौर से ज्यादा नहीं है, केन्द्रीय गृहमंत्री ही होते हैं दिल्ली के असली मुख्यमंत्री

पूर्ण राज्य का दर्जा मिलते ही दिल्ली का मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री के बाद देश का सबसे ताकवर नेता हो जाएगा इसलिए दिल्ली सरकार सदैव नख और दंत विहीन रहेगी।

 

 

भले ही केन्द्रीय सूचना और सूचना प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी कहें कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और मंत्रियों का धरने पर बैठना असंवैधानिक है और इससे कुछ होने वाला नहीं है। कुछ लोग उन्हें अराजक ता का सूत्रधार बता रहे हैं। पर एक बात तो है कि केजरीवाल के इस धरने के साबित हो गया कि दिल्ली राज्य के मुख्यमंत्री की हैसियत किसी शहर के महापौर से ज्यादा नहीं है। इसलिए उनके इस धरने का मकसद दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलवाना ज्यादा नजर आ रहा है। मजेदार बात यह है कि वे इस बात को अभी कह नहीं रहे हैं।
इसके तीन कारण हैं। पहला कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं है। दूसरा कानून व्यवस्था संभालने वाली पुलिस भी केन्द्रीय गृह मंत्रालय के अधीन रहती है। तीसरा और अंतिम ये कि दिल्ली विधानसभा को कानून पास करने के बाद केन्द्रीय गृह मंत्रालय से अनुमति लेनी पड़ती है। इससे यह भी पता चलता है कि दिल्ली राज्य के पास राजदंड या पुलिस नहीं है। यानी वह बिना दांत के शेर के समान है। राज्य सत्ता में दंड यानी भय यानी पुलिस का अहम रोल है। यही राजसत्ता की ताकत का आधार है। जब यही नहीं था तो दिल्ली पुलिस ने भी केजरीवाल के मंत्रियों को भाव नहीं दिए हैं और इसी हताशा में केजरीवाल आज धरने पर बैठ गए।
दिल्ली में १५ साल शीला दीक्षित मुख्यमंत्री रहीं इस दौरान आखिरी दस साल केन्द्र में  कांग्रेस का शासन था इसलिए पुलिस उनकी सुनती थी अब विरोधी दल का शासन है इसलिए दिल्ली पुलिस सुन नहीं रही। केन्द्र सरकार कभी भी नहीं चाहेगी कि वह दिल्ली से अपना नियंत्रण हटाए। पूर्ण राज्य की स्थिति में केन्द्र और राज्य में सीधे टकराव हो सकता है।
पुलिस रहित दिल्ली सरकार के हालात दिल्ली नगर निगम से ज्यादा नहीं हैं। यानी टैक्स वसूलो और जनता को सुविधाओं दो। बिजली, पानी, शिक्षा, परिवहन, रोड, उदय़ोग विभाग में भी काम करने के लिए काफी  स्कोप है। पर सत्ता की ताकत का पता  पुलिस के बगैर नहीं लगता। आपका रौब भी इसी में है कि पुलिस आपको कितना सलाम ठोकती है। पुलिस के बगैर दिल्ली राज्य ऐसा है जैसे बिना सिंदूर के दुल्हन।
दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने में सबसे बड़ी मुश्किल है वीआईपी सुरक्षा। वीआईपी सुरक्षा कौन को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं।  यह बात भी आई कि वीआईपी सुरक्षा के अलावा पुलिस का नियंत्रण दिल्ली सरकार को दे दिया जाए। दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देेने में एक बड़ी दिक्कत यह है कि अगर दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिल गया तो दिल्ली का मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री के बाद देश का सबसे ताकवर नेता हो जाएगा। कोई प्रधानमंत्री नहीं चाहता कि उसके पद की गरिमा से थोड़ा ही कम वाला व्यक्ति दिल्ली में रहे। नेताओं को यह भी डर है कि पूर्ण राज्य का दर्जा मिलने पर पुलिस राज्य सरकार के मातहत हो जाएगी। ऐसी दशा में दिल्ली राज्य और केन्द्र में अलग दलों की सरकार होने पर बड़े टकराव की नौबत आ सकती है।  इसे ही देखते हुए दिल्ली की सरकार को नख और दंत विहीन रखा गया है।

दिल्ली सरकार को दोहरी रिपोर्टिंग में लाए

इसका एक समाधान है कि दिल्ली पुलिस को कारपारेट हाउस की तरह वर्टिकल एंड यूनिट रिर्पोटिंग सिस्टम के तहत लाया जाए।  इसका मतलब है कि वह केन्द्र और राज्य दोनों का रिपोर्ट करे। आफिसियल तौर पर वह केन्द्र के अधीन ही रहेगी लेकिन दिल्ली की रोजाना की कानून-व्यवस्था की स्थिति के लिए वह मुख्यमंत्री के अधीन राज्य के गृह विभाग को रिपोर्ट करेगीे। नियुक्ति, पोस्टिंग और अन्य मसलों के लिए एक समन्वय समिति बनाई जाए।

तो असली मुख्यमंत्री कौन

पिछले दिनों पूर्व गृह सचिव आरके सिंह ने गृहमंत्री शिंदे पर आरोप लगाए थे कि दिल्ली पुलिस में पोस्टिंग उन्हीं के इशारे पर होती है और उनके बगैर दिल्ली पुलिस में पत्ता भी नहीं हिलता। इस लिहाज से दिल्ली के असली मुख्यमंत्री तो केन्द्रीय गृहमंत्री होते हैं और वे एलजी यानी लेफ्टिनेंट गर्वनर के माध्यम से अपनी सरकार चलाते हैं। अभी ये जिम्मा शिंदे के पास हैं यानी दिल्ली के असली मुख्यमंत्री सुशील कुमार शिंदे हैं। इसलिए केजरीवालजी इसे आप जितना जल्दी समझ जाएं अच्छा है।

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